The Eighth Son
सात बच्चे उस कोठरी से गए, एक भी लौटकर नहीं आया। आठवें की रात ताले अपने आप खुलने लगे।
मथुरा में ब्याह का रथ सजा है। कंस अपनी बहन देवकी को विदा करने खुद रथ हाँक रहा है। तभी आकाशवाणी होती है — इसी का आठवाँ बेटा तुझे मारेगा। कंस तलवार खींच लेता है। वसुदेव वचन देते हैं — हर बच्चा आपको सौंप दूँगा। पहला बेटा वसुदेव खुद ले जाते हैं; कंस उसे लौटा देता है। पर नारद मुनि की बात सुनकर कंस का डर जाग उठता है। देवकी-वसुदेव बेड़ियों में डाल दिए जाते हैं, और छह बच्चे एक-एक कर छीने जाते हैं। सातवाँ गर्भ योगमाया चुपचाप गोकुल में रोहिणी तक पहुँचा देती हैं — बलराम। फिर आती है भादों की अंधेरी अष्टमी। आधी रात भगवान चार भुजाओं में प्रकट होते हैं, फिर बालक बन जाते हैं। बेड़ियाँ खुलती हैं, पहरेदार सो जाते हैं। वसुदेव टोकरी सिर पर रखकर उफनती यमुना में उतरते हैं; शेषनाग फन फैलाते हैं और नदी रास्ता दे देती है। गोकुल में यशोदा की बेटी से अदला-बदली होती है। सुबह कंस कन्या को पत्थर पर पटकता है — वह हाथ से छूटकर आकाश में देवी बन जाती है: तुझे मारने वाला जन्म ले चुका है। कंस पहली बार बहन से माफ़ी माँगता है। और गोकुल में नंद के घर बधाइयाँ बजती हैं।
A moment of reflection
यह कहानी अंधेरे में आस्था की है। देवकी और वसुदेव ने सात बार अपनी गोद सूनी होते देखी, फिर भी भगवान पर भरोसा नहीं छोड़ा। और जब चमत्कार हुआ, तब भी वसुदेव को उफनती नदी में खुद उतरना पड़ा — भगवान रास्ता खोलते हैं, पर चलना हमें ही होता है। आज के परिवार भी कठिन रातों से गुज़रते हैं — बीमारी, नुकसान, इंतज़ार। यह कथा कहती है कि सबसे घना अंधेरा अक्सर सवेरे से ठीक पहले होता है। कंस की माफ़ी यह भी दिखाती है कि डर इंसान से क्या-क्या करवा देता है।
Tradition & source notes
श्रीमद्भागवत महापुराण, दशम स्कंध, अध्याय 1–5