The Physician of Nectar
समुद्र से एक वैद्य निकला, हाथ में अमृत का घड़ा — और पहली साँस में ही उस पर हज़ार हाथ झपटे।
देवता और असुर मिलकर क्षीरसागर मथ रहे हैं। ज़हर निकल चुका, रत्न निकल चुके, लक्ष्मी जी विष्णु को चुन चुकी हैं। तभी लहरों से एक साँवला, तेजस्वी पुरुष उठता है — पीले वस्त्र, कानों में कुंडल, हाथों में अमृत से भरा कलश। यह हैं धन्वंतरि, भगवान विष्णु के अंश, आयुर्वेद के जनक। पर उनकी पहली साँस के साथ ही असुर झपटकर कलश छीन लेते हैं। वैद्य, जो सबको जीवन देने के लिए जन्मा, देखता है कि उसकी दवा लूट का माल बन गई है। असुर आपस में ही लड़ने लगते हैं — पहले कौन पिएगा। तभी एक अद्भुत सुंदरी प्रकट होती है — मोहिनी। मोहित असुर कलश उसी को सौंप देते हैं। मोहिनी देवताओं और असुरों को अलग-अलग पंक्तियों में बिठाती है और देवताओं को अमृत पिलाने लगती है। राहु देवता का वेश बनाकर सूर्य और चंद्रमा के बीच जा बैठता है और एक घूँट पी लेता है। सूर्य-चंद्र पहचान लेते हैं, विष्णु का चक्र उसका सिर काट देता है — पर सिर अमर हो चुका है। वही राहु आज भी ग्रहण बनकर लौटता है। अंत में विष्णु धन्वंतरि को वचन देते हैं — अगले जन्म में तुम धरती पर आकर मनुष्यों को रोग से लड़ना सिखाओगे।
A moment of reflection
धन्वंतरि की कहानी हमें बताती है कि अमृत से बड़ा है उसे सही हाथों में पहुँचाने का विवेक। जिस घड़े से सबको जीवन मिल सकता था, वही लालच की वजह से युद्ध बन गया। आज भी हम सेहत को तब याद करते हैं जब वह छिनने लगती है। धनतेरस असल में धन्वंतरि का दिन है — पहला धन, निरोगी काया। इसीलिए इस दिन बर्तन ख़रीदने की रीत है, उस अमृत कलश की याद में। यह कथा परिवारों से कहती है: घर का सबसे बड़ा ख़ज़ाना तिजोरी में नहीं, हर सदस्य की साँस में है — और उसकी रक्षा धैर्य और संयम से होती है।
Tradition & source notes
श्रीमद्भागवत पुराण, स्कंध 8, अध्याय 8–9 / विष्णु पुराण 1.9