The Debt of God
भगवान ने अपनी शादी के लिए कर्ज़ लिया था — और वह कर्ज़ आज भी चुकाया जा रहा है।
ऋषियों को यज्ञ का फल किसे अर्पित करना है, यह तय करने के लिए भृगु ऋषि त्रिदेव की परीक्षा लेने निकलते हैं। ब्रह्मा और शिव से उन्हें आदर नहीं मिलता। वैकुंठ में विष्णु शेषशय्या पर हैं और भृगु की ओर नहीं देखते। क्रोध में भृगु उनकी छाती पर लात मार देते हैं। विष्णु उठते हैं, ऋषि के पैर पकड़कर पूछते हैं — आपके कोमल पैर को चोट तो नहीं लगी? भृगु का अहंकार पिघल जाता है। पर लक्ष्मी आहत हैं — जिस छाती पर मैं रहती हूँ, उसका अपमान हुआ और आपने क्षमा माँगी? वे वैकुंठ छोड़कर धरती पर चली जाती हैं। उन्हें खोजते हुए विष्णु वेंकट पर्वत पर एक बाँबी में तप करने लगते हैं। ब्रह्मा और शिव गाय-बछड़ा बनकर उन्हें दूध पिलाते हैं। वकुला देवी उन्हें बेटे की तरह पालती हैं। शिकार के दौरान उनकी भेंट राजा आकाश की बेटी पद्मावती से होती है, और रिश्ता तय होता है। पर दूल्हे के पास ब्याह का धन नहीं। तब श्रीनिवास कुबेर से कर्ज़ लेते हैं — ब्रह्मा और शिव गवाह बनते हैं, और वचन होता है कि कलियुग के अंत तक ब्याज चुकाया जाएगा। आज तिरुमला में भक्त जो चढ़ाते हैं, माना जाता है कि उसी से भगवान का कर्ज़ चुकता है।
A moment of reflection
यह कहानी भगवान को हमारे बहुत पास ले आती है — ऐसे भगवान जो अपमान पर पलटकर वार नहीं करते, बल्कि अपमान करने वाले का पैर सहलाते हैं। जो रूठी पत्नी को ढूँढते हुए धरती पर आ जाते हैं। जिन्हें भी ब्याह के लिए उधार लेना पड़ता है। आज हर परिवार किसी न किसी कर्ज़ और ज़िम्मेदारी के साथ जीता है, और यह कथा उस बोझ को भी पवित्र बना देती है। वेंकटेश्वर की यह कथा बताती है कि रिश्तों की मरम्मत में अहंकार नहीं, धीरज चाहिए। दीवाली पर लक्ष्मी की पूजा के साथ यह याद रखना अच्छा है कि लक्ष्मी भी कभी रूठकर गई थीं, और स्वयं नारायण उन्हें मनाने निकले थे।
Tradition & source notes
वेंकटाचल माहात्म्य (स्कंद पुराण / भविष्योत्तर पुराण परंपरा)