Fourteen Years, One Day
The final day of waiting approaches, and Bharata’s promise hangs on Rama’s return.
चित्रकूट में भरत ने राम की खड़ाऊँ सिर पर रखकर प्रतिज्ञा की थी — चौदह साल पूरे होने पर अगर अगले दिन राम नहीं लौटे, तो मैं आग में प्रवेश कर लूँगा। तब से भरत अयोध्या के बाहर नंदीग्राम में वल्कल पहने, ज़मीन पर सोते, खड़ाऊँ के नाम पर राज चला रहे हैं। अब चौदह साल पूरे हो चुके हैं। लंका जीतकर राम पुष्पक पर लौट रहे हैं, भरद्वाज मुनि के आश्रम में रुकते हैं, और हनुमान को आगे भेजते हैं — पहले निषादराज गुह के पास, फिर भरत के पास। राम कहते हैं: भरत के चेहरे को ध्यान से देखना; अगर राज का मोह जाग गया हो, तो वह रखे। उधर नंदीग्राम में चिता सजने लगी है, शत्रुघ्न रोक नहीं पा रहे, माताएँ बेचैन हैं। हनुमान मनुष्य का रूप लेकर पहुँचते हैं और देखते हैं — एक दुबला तपस्वी, जो राज करके भी राजा नहीं बना। हनुमान राम के लौटने की ख़बर सुनाते हैं। भरत ख़ुशी से अचेत हो जाते हैं। पूरी अयोध्या सजती है, और भरत अपने हाथों से खड़ाऊँ राम के पैरों में पहनाकर राज लौटा देते हैं।
A moment of reflection
दीवाली की कहानी हम राम के लौटने से सुनते हैं, पर उस दिन का असली इंतज़ार भरत का था। यह कथा उस भाई की है जिसे सब कुछ मिला और जिसने कुछ नहीं लिया। आज जब परिवार ज़मीन-जायदाद पर बँटते हैं, भरत दिखाते हैं कि प्रेम में अधिकार नहीं, सेवा होती है। राम का हनुमान से कहना — देखना, कहीं मन बदल तो नहीं गया — इसमें शक नहीं, भाई की आज़ादी का आदर है। और भरत का चौदह साल एक-एक दिन गिनना हर उस घर की कहानी है जहाँ कोई किसी की राह देख रहा है। दीये उसी राह के लिए जलते हैं।
Tradition & source notes
वाल्मीकि रामायण, अयोध्या कांड (भरत की प्रतिज्ञा) और युद्ध कांड, सर्ग 125–127