The King Who Bought Poverty
राजा ने वचन दिया था कि बाज़ार की हर बिना बिकी चीज़ वह ख़रीदेगा। उस शाम बची थी — दरिद्रता।
एक धर्मात्मा राजा को चिंता है कि उसके नगर में कोई व्यापारी ख़ाली हाथ घर न लौटे। वह घोषणा करता है — शाम तक जो सामान न बिके, राजकोष उसे ख़रीद लेगा। एक दिन एक लोहार लोहे की एक काली, डरावनी मूर्ति लेकर बाज़ार में बैठता है — दरिद्र देव की मूर्ति। कोई उसे छूता तक नहीं। शाम होती है, बात राजा तक पहुँचती है। मंत्री मना करते हैं, पर राजा कहते हैं — वचन वचन है। मूर्ति महल में आती है। उसी रात एक तेजस्वी स्त्री महल से निकलती दिखती है। राजा पूछते हैं — आप कौन? वह कहती है — मैं लक्ष्मी हूँ, जहाँ दरिद्र रहे वहाँ मैं नहीं रह सकती। राजा हाथ जोड़कर विदा करते हैं। फिर दान निकलता है, फिर धर्म। आख़िर में एक शांत पुरुष निकलता है — मैं सत्य हूँ। तब राजा उसका रास्ता रोकते हैं — मैंने सब तुम्हारे लिए खोया, तुम्हें ही निभाने के लिए यह मूर्ति ख़रीदी। तुम कैसे जा सकते हो? सत्य रुक जाता है। और जहाँ सत्य रहे, वहाँ धर्म को लौटना पड़ता है, धर्म के पीछे दान, और दान के पीछे लक्ष्मी। भोर होते ही सब लौट आते हैं, और दरिद्र देव ख़ुद महल छोड़कर चले जाते हैं। नगर दीयों से जगमगा उठता है।
A moment of reflection
यह कथा बताती है कि घर की सबसे बड़ी पूँजी सच है। लक्ष्मी, दान और धर्म — सब उसी की छाया में रहते हैं। राजा ने नुकसान उठाया, डर सहा, पर अपनी बात से पीछे नहीं हटा। आज हम छोटी-छोटी बातों पर वादे तोड़ देते हैं, बच्चों से किए वादे भी। यह कहानी याद दिलाती है कि ज़बान की क़ीमत सबसे ऊँची होती है। दीवाली की रात हम लक्ष्मी को बुलाते हैं, पर यह कथा कहती है — पहले सत्य को घर में रोक लो, लक्ष्मी अपने आप लौट आएँगी।
Tradition & source notes
दीपावली व्रत कथा परंपरा (लोक-कथा)