One Drop, One Demon
उसे मारो तो और बढ़ता है। ख़ून की हर बूँद से एक नया रक्तबीज उठ खड़ा होता है।
शुंभ और निशुंभ ने देवताओं से स्वर्ग छीन लिया है। चंड और मुंड देवी के हाथों मारे जा चुके हैं, और क्रोधित शुंभ अपने सबसे भयानक सेनापति को भेजता है — रक्तबीज। उसे वरदान है कि उसके ख़ून की जो बूँद धरती पर गिरेगी, उससे उसी जैसा एक नया असुर पैदा होगा। युद्ध में देवी चंडिका के साथ देवताओं की शक्तियाँ उतरती हैं — ब्रह्माणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, नारसिंही और ऐंद्री। वे रक्तबीज पर वार करती हैं, और हर घाव से सैकड़ों रक्तबीज निकल आते हैं। कुछ ही देर में पूरा रणक्षेत्र एक ही चेहरे से भर जाता है। देवता डर जाते हैं। तब चंडिका काली से कहती हैं — अपना मुँह फैलाओ, और इसके ख़ून की एक बूँद भी धरती पर मत गिरने दो। काली अपनी लंबी जीभ फैलाती हैं, हर बूँद पी जाती हैं, नए असुरों को भी निगल जाती हैं। रक्तबीज कमज़ोर होता जाता है, और अंत में देवी उसे मार गिराती हैं। शक्तियाँ नाचती हैं, देवता फूल बरसाते हैं।
A moment of reflection
रक्तबीज एक असुर भर नहीं, एक सच्चाई है। ग़ुस्सा, लालच, डर — इन्हें सीधे मारो तो ये दोगुने होकर लौटते हैं। एक झगड़ा दस झगड़े पैदा करता है, एक बुरी आदत बहाना बनकर लौटती है। देवी का उत्तर है: जड़ को धरती तक पहुँचने ही मत दो। काली का रूप डराता है, पर वह माँ का सबसे रक्षा करने वाला रूप है। दीवाली की अमावस, जब बंगाल और पूरब में काली पूजा होती है, यह कथा बताती है कि अंधेरे से लड़ने के लिए कभी-कभी उससे भी गहरी शक्ति चाहिए — जो डर को निगल ले।
Tradition & source notes
मार्कंडेय पुराण, दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य), अध्याय 8
