The Curse of a Smile
नारायण लक्ष्मी की ओर देखकर हँसे। लक्ष्मी ने समझा, मज़ाक़ उड़ा — और मुँह से श्राप निकल गया।
वैकुंठ में एक शांत पल। विष्णु लक्ष्मी का चेहरा देखते हैं और अचानक हँस पड़ते हैं। लक्ष्मी का मन शंका से भर जाता है — क्या मेरे चेहरे में कुछ कुरूप दिखा? या इनके मन में कोई और है? वे कह बैठती हैं — तुम्हारा यह सिर धड़ से अलग हो जाए। शब्द निकलते ही वे काँप जाती हैं, पर श्राप लौटता नहीं। उधर हयग्रीव नाम का घोड़े के सिर वाला दैत्य देवी की तपस्या करके वर पा चुका है — उसे केवल घोड़े के सिर वाला ही मार सकेगा। लंबे युद्ध से थके विष्णु अपने धनुष की नोक पर सिर टिकाकर खड़े-खड़े सो जाते हैं। ब्रह्मा वम्री नाम की दीमक बनाते हैं कि वह धनुष की डोरी कुतर दे और डोरी की आवाज़ से प्रभु जागें। डोरी कटती है — भयंकर आवाज़ के साथ विष्णु का सिर कटकर उड़ जाता है। देवता विलाप करते हैं। बृहस्पति कहते हैं — महादेवी की शरण लो। देवी प्रकट होकर लक्ष्मी के श्राप और हयग्रीव के वर का भेद खोलती हैं। विश्वकर्मा एक घोड़े का सिर जोड़ते हैं, और हयग्रीव रूप में विष्णु उस दैत्य का वध करते हैं। लक्ष्मी की आँखों में पछतावा और राहत, दोनों हैं।
A moment of reflection
एक पल का शक, एक पल का गुस्सा — और मुँह से निकला शब्द। यह कथा उस पल की है जिसे हर घर जानता है, जब हम किसी अपने की हँसी या चुप्पी का ग़लत मतलब निकाल लेते हैं। लक्ष्मी भी उस पल से नहीं बच पाईं। पर कथा यहीं ख़त्म नहीं होती — वही श्राप, देवी की इच्छा से, संसार के भले का साधन बन जाता है। यह बताती है कि बड़ी शक्तियों के भी पछतावे होते हैं, और टूटे हुए को जोड़ने का रास्ता हमेशा होता है। दीवाली पर लक्ष्मी की पूजा करते हुए यह कथा याद दिलाती है कि घर की लक्ष्मी भरोसे से टिकती है, शक से नहीं।
Tradition & source notes
देवी भागवत पुराण, स्कंध 1, अध्याय 5