When Lakshmi Walked Away
एक माला ज़मीन पर गिरी — और स्वर्ग का सारा धन उसके साथ चला गया।
ऋषि दुर्वासा धरती पर घूम रहे हैं। एक विद्याधरी उन्हें दिव्य फूलों की माला भेंट करती है, सुगंध से भरी। रास्ते में इंद्र ऐरावत पर सवार आते दिखते हैं। दुर्वासा प्रेम से वह माला इंद्र को दे देते हैं। विजय के नशे में डूबे इंद्र उसे ऐरावत के सिर पर रख देते हैं। हाथी सुगंध से चिढ़कर माला ज़मीन पर फेंकता है और पैरों तले कुचल देता है। दुर्वासा का क्रोध फूटता है — जिस वैभव के घमंड में तुमने मेरा दिया अपमानित किया, वह तीनों लोकों से चला जाएगा। इंद्र पैरों में गिरते हैं, पर दुर्वासा मुड़कर चले जाते हैं। उसी दिन से लक्ष्मी स्वर्ग छोड़ देती हैं। पेड़-पौधे मुरझाते हैं, यज्ञ रुकते हैं, देवताओं का तेज घटता है। मौका देखकर असुर आक्रमण करते हैं और देवता हार जाते हैं। टूटे हुए इंद्र ब्रह्मा के साथ क्षीरसागर पहुँचते हैं। विष्णु कहते हैं — असुरों से संधि करो, समुद्र मथो, लक्ष्मी लौटेंगी। मंथन से लक्ष्मी कमल पर बैठी प्रकट होती हैं और विष्णु के हृदय में स्थान लेती हैं। इंद्र पूरे मन से उनकी स्तुति करते हैं। लक्ष्मी वरदान देती हैं — मैं अब तीनों लोकों को नहीं छोड़ूँगी, और जो यह स्तुति करेगा, उसका घर मैं नहीं छोड़ूँगी।
A moment of reflection
लक्ष्मी रूठती हैं तो सिर्फ़ पैसा नहीं जाता — तेज, उत्साह, हरियाली, रिश्तों की मिठास, सब चला जाता है। विष्णु पुराण की यह कथा बताती है कि समृद्धि घमंड के साथ नहीं रहती। इंद्र ने माला का नहीं, देने वाले के प्रेम का अपमान किया था। आज के घरों में भी यही होता है — जब सफलता आती है तो हम छोटे उपहारों, छोटे लोगों की कद्र भूल जाते हैं। दीवाली पर हम लक्ष्मी को बुलाते हैं, पर यह कथा याद दिलाती है कि उन्हें टिकाए रखना विनम्रता से होता है। और जब सब छिन जाए, तब भी रास्ता है — मिलकर मेहनत करना और सच्चे मन से पुकारना।
Tradition & source notes
विष्णु पुराण, अंश 1, अध्याय 9
