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Mahabharata traditions

When the Court Fell Silent

द्रौपदी ने भरी सभा से एक सवाल पूछा। बड़े-बड़े ज्ञानी थे वहाँ — किसी ने जवाब नहीं दिया।

Original Hindi textDetailed story synopsis

इंद्रप्रस्थ के राजसूय यज्ञ के बाद दुर्योधन माया सभा का वैभव देखकर जल उठा है। शकुनि उपाय बताता है — युद्ध नहीं, चौसर। धृतराष्ट्र विदुर को न्योता लेकर भेजते हैं, और युधिष्ठिर मना नहीं कर पाते। खेल शुरू होता है। शकुनि के पासे हर बार जीतते हैं — धन, गायें, राज्य, फिर भाई एक-एक कर, फिर युधिष्ठिर खुद। और तब शकुनि कहता है — अभी एक दाँव बचा है, द्रौपदी। दूत द्रौपदी को बुलाने जाता है, पर वह एक सवाल लौटा देती है — महाराज ने पहले खुद को हारा या मुझे? जो खुद हार चुका, वह मुझे कैसे दाँव पर लगा सकता है? दुःशासन उसे बालों से घसीटकर सभा में लाता है। द्रौपदी भीष्म, द्रोण, विदुर, सबसे वही सवाल पूछती है। भीष्म कहते हैं — धर्म की गति सूक्ष्म है। कौरव भाई विकर्ण खड़ा होकर कहता है — यह अन्याय है। वस्त्र खींचा जाता है; द्रौपदी गोविंद को पुकारती है, और साड़ी खत्म ही नहीं होती। भीम प्रतिज्ञा करते हैं — दुःशासन की छाती चीरूँगा, दुर्योधन की जाँघ तोड़ूँगा। अपशकुन से डरे धृतराष्ट्र द्रौपदी को वर देते हैं, वह पतियों को मुक्त कराती है। पर फिर एक और दाँव, और पांडव तेरह बरस के वनवास पर निकल पड़ते हैं।

A moment of reflection

इस कथा का सबसे बड़ा खलनायक कोई एक आदमी नहीं, वह चुप्पी है जो ज्ञानी और बड़े लोग अन्याय के सामने साध लेते हैं। द्रौपदी ने रोकर नहीं, सवाल पूछकर सभा को कटघरे में खड़ा किया। आज भी घरों, दफ़्तरों और समाज में यही होता है — सब देखते हैं, पर कोई नहीं बोलता। विकर्ण जैसा एक अकेला सच बोलने वाला दिखाता है कि आवाज़ उठाने के लिए ताकत नहीं, हिम्मत चाहिए। और द्रौपदी की पुकार पर भगवान का आना सिखाता है कि जब सारे सहारे छूट जाएँ, तब भी विश्वास बचा रहता है।

Tradition & source notes

महाभारत, सभा पर्व (द्यूत पर्व व अनुद्यूत पर्व)

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