When Shiva Begged for Food
शिव ने कहा — अन्न तो माया है। उसी दिन दुनिया से अन्न ग़ायब हो गया।
कैलाश पर शिव और पार्वती में एक बहस छिड़ती है। शिव कहते हैं — यह संसार माया है, शरीर माया है, और अन्न भी माया। पार्वती, जो प्रकृति हैं, जो हर जीव का पेट भरती हैं, इस बात से आहत होती हैं। वे कहती हैं — अगर अन्न माया है, तो देखो इसके बिना क्या होता है। और वे अंतर्धान हो जाती हैं। धरती सूखने लगती है। खेत बंजर, चूल्हे ठंडे, बच्चे भूखे। ऋषि, देवता, पशु-पक्षी, सब तड़पते हैं। कैलाश पर शिव के गण भी भूखे हैं, और स्वयं शिव को भूख का अर्थ समझ आने लगता है। तभी ख़बर मिलती है कि काशी में एक रसोई है जहाँ अब भी अन्न बँट रहा है। वहाँ एक देवी सोने की करछी से सबको खिला रही हैं। शिव भिक्षापात्र लेकर काशी पहुँचते हैं और कतार में खड़े होते हैं। देवी अन्नपूर्णा — स्वयं पार्वती — उनके पात्र में अन्न डालती हैं। शिव मान लेते हैं कि जो शरीर को पालता है, वह भी उतना ही पवित्र है जितना मोक्ष। पार्वती लौटती हैं, धरती हरी होती है, और काशी अन्नपूर्णा का धाम बनती है।
A moment of reflection
हम अक्सर पूजा को ऊँचा और रोटी को छोटा समझते हैं। यह कथा कहती है: भूखे पेट न ध्यान होता है, न भजन। अन्न में माँ का वास है, और हर वह हाथ जो रसोई चलाता है, पूजा ही कर रहा है। घर की वह माँ, जो सालों से सबको खिलाती आई और जिसका काम किसी ने गिना नहीं — यह कहानी उसी का सम्मान है। शिव का कतार में खड़ा होना बताता है कि सबसे बड़ा भी अन्न के आगे याचक है। अन्नकूट पर जब छप्पन भोग सजते हैं, यह याद दिलाती है कि अन्न को कभी बर्बाद न करें — वह माँ का प्रसाद है।
Tradition & source notes
माँ अन्नपूर्णा की काशी परंपरा (अन्नपूर्णा कथा, स्कंद पुराण काशी खंड परंपरा)
