The Boy Who Died One Afternoon
1896 की एक दोपहर मदुरै में सोलह बरस का स्कूली लड़का वेंकटरमण अचानक मौत के डर से घिर जाता है, फ़र्श पर लाश की तरह लेटकर साँस रोक लेता है और ख़ुद से पूछता है कि अगर यह शरीर मर गया तो मरा कौन; कुछ हफ़्ते बाद वह एक पर्ची छोड़कर घर से निकल जाता है कि मैं अपने पिता की खोज में जा रहा हूँ, और अरुणाचल की गुफाओं में बरसों मौन बैठा वही लड़का दुनिया को एक ही सवाल देता है: मैं कौन हूँ?
This is an outline of the story. The full narrative is coming soon.
1896 की एक दोपहर मदुरै में सोलह बरस का स्कूली लड़का वेंकटरमण अचानक मौत के डर से घिर जाता है, फ़र्श पर लाश की तरह लेटकर साँस रोक लेता है और ख़ुद से पूछता है कि अगर यह शरीर मर गया तो मरा कौन; कुछ हफ़्ते बाद वह एक पर्ची छोड़कर घर से निकल जाता है कि मैं अपने पिता की खोज में जा रहा हूँ, और अरुणाचल की गुफाओं में बरसों मौन बैठा वही लड़का दुनिया को एक ही सवाल देता है: मैं कौन हूँ?
Tradition & source notes
ऐतिहासिक: रमण महर्षि के अपने कथन (1896, मदुरै का मृत्यु-अनुभव), उनकी पुस्तिका 'नान यार्' (मैं कौन हूँ), बी. वी. नरसिंह स्वामी की जीवनी 'Self-Realization'; तिरुवण्णामलै (अरुणाचल) के प्रसंग; कुछ विवरण आश्रम-परंपरा से
