Lakshmi's Son
तीनों लोकों का धन जिसके पास था, उसकी गोद सूनी थी।
वैकुंठ में लक्ष्मी अपने वैभव की बात कर रही हैं — मैं ही तो सबको सुख देती हूँ, मुझसे बड़ा कौन? विष्णु मुस्कुराते हैं और धीरे से कहते हैं — तुमने सबको सब दिया, पर माँ बनकर देने का सुख तुमने कभी नहीं जाना। यह बात लक्ष्मी के मन में उतर जाती है। वे पहली बार अपने भीतर एक ख़ालीपन देखती हैं। दिन बीतते हैं, पर वह चुभन नहीं जाती। आख़िर वे कैलाश जाती हैं, पार्वती के पास। पार्वती के दो बेटे हैं — कार्तिकेय और गणेश। लक्ष्मी झिझकते हुए कहती हैं — अपना एक बेटा मुझे दे दो। पार्वती ठिठकती हैं। वे जानती हैं कि लक्ष्मी चंचल हैं, एक जगह नहीं टिकतीं — मेरा बेटा कहीं अकेला न रह जाए? लक्ष्मी वचन देती हैं — मैं उसे कभी नहीं छोड़ूँगी। पार्वती गणेश को उनकी गोद में सौंप देती हैं। गणेश माँ को देखते हैं, फिर नई माँ को, और हँस पड़ते हैं। भावुक लक्ष्मी घोषणा करती हैं — आज से जो मेरी पूजा गणेश के बिना करेगा, उसके घर मैं नहीं टिकूँगी। धन के साथ बुद्धि चाहिए, और बुद्धि के देवता अब मेरे बेटे हैं। तभी से दीवाली की रात लक्ष्मी और गणेश एक साथ विराजते हैं।
A moment of reflection
दीवाली पर हर घर में लक्ष्मी के साथ गणेश बैठते हैं, पर बहुत कम लोग जानते हैं क्यों। यह कथा बताती है कि धन अकेले घर नहीं बसाता — उसके साथ समझ चाहिए, वरना वह टिकता नहीं। लक्ष्मी का घमंड तोड़ा नहीं गया, पिघलाया गया, और उसकी जगह ममता आई। पार्वती का त्याग भी कम नहीं — अपना बेटा किसी और की गोद में देना। आज के परिवारों में, जहाँ गोद लेने और रिश्तों के नए रूप सामने आते हैं, यह कथा बताती है कि माँ होना जन्म से नहीं, प्रेम और वचन से होता है। यह कथा पूजा की थाली को एक परिवार की तस्वीर में बदल देती है।
Tradition & source notes
दीपावली लोक-परंपरा (लक्ष्मी-गणेश पूजन की कथा)
