Lakshmi's Choice
तीनों लोक उसे पाना चाहते थे। उसने उसे चुना, जिसने उसकी ओर देखा तक नहीं।
देवता और असुर एक असंभव काम पर राज़ी होते हैं — क्षीरसागर को मथकर अमृत निकालना। मंदराचल पर्वत मथानी बनता है, नागराज वासुकि रस्सी। पर्वत डूबने लगता है तो भगवान विष्णु कछुआ बनकर उसे पीठ पर थाम लेते हैं। मंथन शुरू होते ही सबसे पहले निकलता है हलाहल — ऐसा ज़हर जिसकी भाप से दिशाएँ काली पड़ जाती हैं। सिर्फ़ शिव आगे आते हैं। पार्वती जानती हैं कि उनके पति क्या करने जा रहे हैं, और हाँ कहती हैं। शिव ज़हर पीते हैं, वह उनके कंठ में ठहर जाता है — वे नीलकंठ बनते हैं। फिर एक-एक कर ख़ज़ाने निकलते हैं, और हर एक पर झगड़ा होता है। और फिर लहरें शांत हो जाती हैं — कमल पर बैठी लक्ष्मी प्रकट होती हैं। सब उन्हें पाना चाहते हैं। लक्ष्मी हाथ में माला लिए सबको परखती हैं: किसी में तप है पर क्रोध नहीं गया, किसी में ज्ञान है पर मोह नहीं छूटा, कोई महान है पर काल के अधीन है। अंत में उनकी नज़र उस पर ठहरती है जो उनकी ओर देख भी नहीं रहा — भगवान विष्णु। वे माला उन्हीं के गले में डालती हैं और उनके हृदय में बस जाती हैं। तभी लहरों से एक और आकृति उठती है — अमृत कलश लिए धन्वंतरि।
A moment of reflection
लक्ष्मी का चुनाव इस कथा का दिल है। वे उस पर नहीं रुकीं जो सबसे ज़्यादा चाहता था, बल्कि उस पर जो उन्हें पाने के लिए बेचैन नहीं था। धन उसी के पास टिकता है जो उसका दास नहीं होता। और उससे पहले शिव ने दिखाया कि किसी भी बड़ी उपलब्धि से पहले किसी को ज़हर पीना पड़ता है — घर में भी, कोई न कोई चुपचाप कड़वाहट पीता है ताकि बाकी सब आगे बढ़ सकें। दीवाली की रात जब हम लक्ष्मी को बुलाते हैं, यह कथा पूछती है: क्या हमारे घर में वह संतोष है जिसे देखकर लक्ष्मी रुक जाएँ?
Tradition & source notes
श्रीमद्भागवत पुराण, स्कंध 8, अध्याय 5–8 / विष्णु पुराण 1.9