Lakshmi's Elder Sister
लक्ष्मी की एक बड़ी बहन भी है। वह आज भी हर घर का दरवाज़ा खटखटाती है।
समुद्र मंथन से लक्ष्मी से पहले एक और स्त्री निकलती है — रूखी, उदास, अँधेरे से घिरी। यह है ज्येष्ठा, बड़ी बहन, जिसे लोग अलक्ष्मी कहते हैं। कोई उसे अपनाना नहीं चाहता। छोटी बहन का ब्याह तो विष्णु से हो जाता है, पर बड़ी बहन पूछती है — मेरा क्या? देवता उसका ब्याह दुःसह नाम के ऋषि से करा देते हैं। मार्कंडेय ऋषि दुःसह को बताते हैं कि कहाँ जाना है और कहाँ नहीं — जिस घर में झगड़ा हो, गंदगी हो, बड़ों का अपमान हो, वहाँ तुम्हारी पत्नी रह सकती है; जिस घर में पूजा हो, सफ़ाई हो, मीठा बोला जाए, वहाँ पैर मत रखना। हर जगह पूजा के स्वर से उन्हें लौटना पड़ता है। थककर दुःसह एक बिल में उतर जाते हैं और ज्येष्ठा अकेली रह जाती है। वह रोती है। तब भगवान विष्णु आकर उसे सांत्वना देते हैं और पीपल की जड़ में उसका ठिकाना बनाते हैं। वे कहते हैं — जो स्त्रियाँ तुम्हें भोग देंगी, उनके घर लक्ष्मी रहेंगी। पीपल में शनिवार को लक्ष्मी भी आती हैं, इसीलिए उस दिन पीपल पूजा जाता है। तभी से दीवाली से पहले घर की सफ़ाई, कलह का अंत और दीयों की रोशनी — ताकि बड़ी बहन आदर से विदा हो और छोटी बहन घर आ सके।
A moment of reflection
यह कथा अलक्ष्मी को राक्षसी नहीं, एक अनचाही बेटी की तरह दिखाती है — जो पहले जन्मी, पर जिसे किसी ने नहीं चाहा। उसका घर वहाँ बनता है जहाँ हम ख़ुद उसके लिए जगह छोड़ते हैं: कलह में, आलस में, गंदगी में, कड़वे बोल में। यानी दरिद्रता बाहर से नहीं आती, हमारी आदतों से पलती है। आज हर घर दीवाली से पहले सफ़ाई करता है, पर यह कहानी बताती है कि असली सफ़ाई मन और ज़बान की है। उसे भगाना नहीं, आदर से विदा करना है — और यही बात इस कथा को बहुत मानवीय और आज के परिवारों के लिए सच्ची बनाती है।
Tradition & source notes
पद्म पुराण (उत्तर खंड) / लिंग पुराण, उत्तर भाग, अध्याय 6 — ज्येष्ठा (अलक्ष्मी) की कथा