A Handful of Rice
वो दोस्त से कुछ माँगने गया था। कुछ माँग न सका — और लौटा तो अपना घर पहचान नहीं पाया।
सुदामा एक ग़रीब ब्राह्मण हैं। घर में अक्सर चूल्हा नहीं जलता, बच्चे भूखे सोते हैं, पर सुदामा किसी से कुछ नहीं माँगते। उनकी पत्नी सुशीला एक दिन हिम्मत करके कहती हैं — द्वारका के राजा कृष्ण तो तुम्हारे बचपन के मित्र हैं, एक बार जाओ। सुदामा झिझकते हैं। फिर मान जाते हैं, पर ख़ाली हाथ कैसे जाएँ? सुशीला पड़ोस से चार मुट्ठी चिवड़ा माँगकर एक फटे कपड़े में बाँध देती हैं। सुदामा पैदल द्वारका पहुँचते हैं — सोने के महल, पहरेदार, और उनकी फटी धोती। पर कृष्ण उन्हें देखते ही दौड़ पड़ते हैं, गले लगाते हैं, अपने पलंग पर बिठाते हैं, अपने हाथों से पैर धोते हैं, और रुक्मिणी पंखा झलती हैं। दोनों संदीपनि गुरु के आश्रम की बातें करते हैं — वह तूफ़ानी रात जब दोनों लकड़ी लाने जंगल में फँस गए थे। कृष्ण पूछते हैं — भाभी ने मेरे लिए क्या भेजा? सुदामा पोटली छुपाते हैं; कृष्ण छीनकर एक मुट्ठी खा लेते हैं। दूसरी मुट्ठी पर रुक्मिणी हाथ पकड़ लेती हैं। सुदामा कुछ माँगे बिना लौटते हैं, मन में सोचते हुए कि अच्छा हुआ। गाँव पहुँचते हैं, तो उनकी झोंपड़ी की जगह महल खड़ा है।
A moment of reflection
सुदामा की कथा ग़रीबी की नहीं, स्वाभिमान और प्रेम की कहानी है। सुदामा माँगने गए, पर प्रेम ने माँगने नहीं दिया; कृष्ण देना चाहते थे, पर दोस्ती ने कहने नहीं दिया। आज जब रिश्ते लेन-देन से नापे जाते हैं, यह कथा याद दिलाती है कि सच्चा मित्र आपकी हालत नहीं, आपका मन देखता है। मुट्ठी भर चिवड़ा बताता है कि भगवान को दी गई छोटी सी चीज़ भी, अगर भाव से दी जाए, तो पूरी दुनिया पर भारी है। धनतेरस और दीवाली पर जब सब धन की कामना करते हैं, सुदामा सिखाते हैं कि असली धन वह है जो बिना माँगे मिले।
Tradition & source notes
श्रीमद्भागवत पुराण, स्कंध 10, अध्याय 80–81