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Puranic stories

The Friend at the Peepal Tree

रोज़ पीपल को जल देने वाली लड़की से एक दिन पेड़ ने कहा — मुझसे दोस्ती करोगी?

Original Hindi textDetailed story synopsis

एक साहूकार के बुरे दिन चल रहे हैं। घर में अनाज कम है, पर उसकी बेटी सुधा हर सुबह पीपल के पेड़ को जल चढ़ाना नहीं छोड़ती। एक दिन पेड़ के पीछे से एक सुंदर स्त्री निकलती है और कहती है — मुझसे दोस्ती करोगी? पिता की हाँ के बाद दोनों रोज़ मिलने लगती हैं। एक दिन वह सुधा को अपने घर बुलाती है — सोने की चौकी, छत्तीस तरह का भोजन। फिर वह कहती है — अब मैं तुम्हारे घर आऊँगी। सुधा उदास है — घर में चौकी तक नहीं। पिता कहते हैं — घर लीप दो, चौमुखा दीया जलाओ, जो है उसी से सत्कार करो। सुधा आँगन बुहार रही होती है कि ऊपर से एक चील रानी का नौलखा हार गिरा जाती है। सुधा हार लेकर महल जाती है, पर रानी कहती हैं — जिसे चील दे गई, वह उसी का भाग्य है। उसी हार से सुधा अपनी सहेली के सत्कार की तैयारी करती है। शाम को वह स्त्री आती है, और तब सुधा जानती है — उसकी सहेली स्वयं लक्ष्मी हैं। लक्ष्मी भोजन करती हैं, और उस घर का आँगन फिर कभी सूना नहीं होता। तभी से कार्तिक में पीपल को जल देने और दीवाली पर लक्ष्मी को सहेली की तरह बुलाने की रीत है।

A moment of reflection

यह कथा बहुत कोमल है — भगवान से डरने की नहीं, दोस्ती की। सुधा ने कुछ माँगा नहीं; वह बस रोज़ पेड़ को पानी देती रही, जैसे कोई अपने को देता है। और लक्ष्मी ख़ुद उसके पास आईं। आज की लड़कियाँ, घर की बेटियाँ, बहुएँ — इस कहानी में ख़ुद को देखेंगी: थोड़े में घर चलाना, इज़्ज़त बचाना, और फिर भी मन साफ़ रखना। हार लौटाने जाना बताता है कि ग़रीबी में भी ईमान नहीं बिकता। दीवाली पर हम घर लीपते हैं, दीया जलाते हैं, लक्ष्मी को बुलाते हैं — यह कथा बताती है कि उन्हें मेहमान नहीं, सहेली की तरह बुलाइए।

Tradition & source notes

कार्तिक / दीपावली लक्ष्मी व्रत कथा (साहूकार की बेटी की कथा, लोक-परंपरा)

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