Rantideva's One Mistake
जिस राजा ने जीवन भर किसी को भूखा नहीं लौटाया, उसके दरवाज़े पर यमदूत खड़े थे। वजह — एक भूखा ब्राह्मण।
राजा रंतिदेव का नाम दान के लिए जाना जाता है। एक बार अकाल में उन्होंने अड़तालीस दिन बिना अन्न-जल के बिताए, उनचासवें दिन थोड़ा भोजन मिला तो पहले एक ब्राह्मण, फिर एक शूद्र, फिर कुत्तों वाला एक चांडाल आया — उन्होंने सब बाँट दिया। आख़िर में बचा पानी भी एक प्यासे को पिला दिया और कहा — मुझे मोक्ष नहीं चाहिए, मुझे सबका दुख चाहिए। तब उन मेहमानों के पीछे छिपे त्रिदेव प्रकट हुए। बरसों बाद, बुढ़ापे की एक शाम, उनके द्वार पर यमदूत आ खड़े होते हैं। रंतिदेव हैरान हैं — मैंने कौन सा पाप किया? दूत कहते हैं — एक बार एक भूखा ब्राह्मण तुम्हारे द्वार से बिना भोजन लौटा था। उसी का फल नरक है। राजा एक बरस का समय माँगते हैं। अब शुरू होती है स्मृति की खोज — कौन था वह ब्राह्मण, कब, क्यों? राजा ऋषियों के पास जाते हैं। ऋषि कहते हैं — कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी का व्रत करो, ब्राह्मणों को भोजन कराओ, और सच्चे मन से क्षमा माँगो। अगले बरस जब यमदूत लौटते हैं, तो उनके पास ले जाने को कुछ नहीं होता। राजा नरक से मुक्त होकर भगवान के धाम जाते हैं। तभी से नरक चतुर्दशी का व्रत चला।
A moment of reflection
यह कहानी बताती है कि अच्छाई का बहीखाता भी पूरा होता है — हज़ार भले काम एक अनदेखी भूल को मिटा नहीं देते, पर पश्चाताप उसे धो सकता है। रंतिदेव महान थे, फिर भी एक दिन की जल्दबाज़ी उनके पीछे आई। आज की भागदौड़ में हम भी किसी की पुकार अनसुनी कर देते हैं — बूढ़े माता-पिता की, किसी ज़रूरतमंद की। यह कथा डराती नहीं, राह दिखाती है: भूल मानना, क्षमा माँगना और भूखे को खिलाना। नरक चतुर्दशी अँधेरे को विदा करने का दिन है — और सबसे गहरा अँधेरा वह भूल है जिसे हमने कभी याद ही नहीं किया।
Tradition & source notes
नरक चतुर्दशी व्रत कथा (पद्म पुराण परंपरा) / श्रीमद्भागवत पुराण, स्कंध 9, अध्याय 21