ॐBhakti Aanganभक्ति आंगन
Mahabharata traditions

Bheem the Cook

एक बरस छिपकर रहना था, पहचाने गए तो फिर वनवास। तभी सेनापति कीचक की नज़र सैरंध्री पर पड़ी।

Original Hindi textDetailed story synopsis

बारह बरस वनवास के बाद पांडवों को एक बरस अज्ञातवास में बिताना था। वे वेश बदलकर राजा विराट के महल में रहने लगे: युधिष्ठिर कंक बने, राजा के पासे के साथी; भीम बल्लव नाम के रसोइए; अर्जुन नृत्य सिखाने वाली बृहन्नला; नकुल-सहदेव घोड़ों और गायों के रखवाले; और द्रौपदी रानी सुदेष्णा की दासी सैरंध्री। दस महीने सब ठीक चला। फिर रानी के भाई, राज्य के सेनापति कीचक की बुरी नज़र सैरंध्री पर पड़ी। वह उसके पीछे पड़ गया, और एक दिन भरी सभा में राजा के सामने उसे ठोकर मार दी। कंक बने युधिष्ठिर ने आँखों के इशारे से भीम को रोक लिया, क्योंकि पहचान खुलना सबका सर्वनाश था। उस रात द्रौपदी चुपचाप रसोई में भीम के पास पहुँची। भीम ने उपाय निकाला — कीचक को रात में सूनी नृत्यशाला बुलाओ। अँधेरे में सैरंध्री की जगह भीम बैठे थे। दोनों में भयानक मल्लयुद्ध हुआ और भीम ने कीचक का अंत कर दिया। सुबह कहा गया कि सैरंध्री के गंधर्व पतियों ने बदला लिया है। कीचक के भाइयों ने सैरंध्री को उसकी चिता के साथ जलाना चाहा, तो भीम पेड़ उखाड़कर पहुँचे और उसे छुड़ा लाए। पर दूर हस्तिनापुर में खबर सुनकर दुर्योधन ठिठक गया — ऐसा बल तो बस भीम में है।

A moment of reflection

यह कथा सहने और चुप रहने के बीच के फ़र्क की है। अज्ञातवास में पांडवों ने अपमान सहा, नौकर बनकर सेवा की — यह धैर्य था। पर जब एक स्त्री की मर्यादा पर हाथ उठा, तब चुप रहना धैर्य नहीं, कायरता होती। भीम ने अपना वचन भी निभाया और पत्नी का मान भी रखा — बिना पहचान खोले, सूझ-बूझ से, सही समय पर। आज के घरों के लिए इसमें साफ़ संदेश है: घर की बेटी-बहू जब अपना दुख कहे, तो उसे सुना जाए और उसके साथ खड़ा हुआ जाए। और बड़ा से बड़ा बल सबसे सुंदर तब दिखता है, जब वह किसी की रक्षा के लिए उठता है।

Tradition & source notes

महाभारत — विराट पर्व (पांडव-प्रवेश पर्व और कीचक-वध पर्व, अध्याय 1–24)

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