Satyabhama's Bow
सोलह हज़ार एक सौ बेटियाँ क़ैद थीं। उन्हें छुड़ाने कृष्ण अकेले नहीं गए — सत्यभामा धनुष लेकर साथ गईं।
प्राग्ज्योतिषपुर का राजा नरकासुर, धरती माता का बेटा, वरदान के घमंड में अंधा हो चुका है। उसने देवमाता अदिति के कुंडल छीन लिए, वरुण का छत्र उठा लिया, और सोलह हज़ार एक सौ राजकुमारियों को क़ैद कर रखा है। इंद्र द्वारका आकर कृष्ण से गुहार लगाते हैं। कृष्ण युद्ध के लिए निकलते हैं तो सत्यभामा अड़ जाती हैं — मैं भी चलूँगी। गरुड़ पर सवार होकर दोनों प्राग्ज्योतिषपुर पहुँचते हैं। नगर पहाड़ों, शस्त्रों, जल, आग और आँधी के घेरों से घिरा है, और सबसे बाहर पाँच सिर वाले दैत्य मुर के फंदे। कृष्ण एक-एक घेरा तोड़ते हैं, मुर का वध करते हैं और मुरारी कहलाते हैं। सत्यभामा धनुष उठाकर गरुड़ की रक्षा करती हैं और नरक की सेना से लड़ती हैं। अंत में नरकासुर हाथी पर चढ़कर आता है और सुदर्शन चक्र उसका अंत करता है। धरती माता स्वयं आकर कुंडल लौटाती हैं और अपने पोते को कृष्ण की शरण में सौंपती हैं। क़ैदखाने के दरवाज़े खुलते हैं। राजकुमारियाँ कहती हैं — अब हमें कौन अपनाएगा? कृष्ण उन्हें सम्मान के साथ द्वारका ले जाते हैं। उस रात से नरक चतुर्दशी पर अँधेरे पर रोशनी की जीत का दीया जलता है।
A moment of reflection
नरक चतुर्दशी सिर्फ़ एक दैत्य के मरने का दिन नहीं, उन सोलह हज़ार बेटियों की आज़ादी का दिन है जिन्हें समाज ने पहले ही पराया मान लिया था। कृष्ण ने उन्हें सिर्फ़ छुड़ाया नहीं, इज़्ज़त दी। और सत्यभामा की ज़िद बताती है कि धर्म की लड़ाई में स्त्री दर्शक नहीं, साथी है। आज के परिवारों में, जहाँ बेटियाँ हर मैदान में उतर रही हैं, यह कथा पुरानी होकर भी नई लगती है। यह हमें यह भी याद दिलाती है कि घमंड चाहे जितना बड़ा हो, उसका अंत तय है — और उसके बाद भी करुणा बचनी चाहिए, जैसे धरती माता ने बेटे के लिए रोते हुए भी न्याय को स्वीकारा।
Tradition & source notes
श्रीमद्भागवत पुराण, स्कंध 10, अध्याय 59 / हरिवंश; सत्यभामा के युद्ध की लोक-परंपरा
