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Puranic stories

The Lamp of the Fourth Night

A foretold danger, a bride’s resolve, and a night illuminated by lamps.

Original Hindi textDetailed story synopsis

राजा हिम के घर बरसों बाद बेटा हुआ, पर जन्मपत्री देखते ही राजज्योतिषी का चेहरा उतर गया — यह बालक ब्याह की चौथी रात साँप के डसने से मरेगा। राजा-रानी ने यह सच महल की दीवारों में दबा दिया और बेटे को हर सुख दिया। सोलह बरस बाद एक समझदार, निडर राजकुमारी से उसका ब्याह हुआ। तीसरे दिन उसे एक दासी के आँसुओं से सच का पता चला। वह रोई, फिर संभली, और सास-ससुर से बोली — चौथी रात मुझे सौंप दीजिए। उस रात उसने कमरे की देहरी पर अपने सारे गहनों और सोने-चाँदी के सिक्कों का ढेर लगाया, महल के कोने-कोने में दीये जलवाए और पति को एक पल भी सोने नहीं दिया। वह पूरी रात कहानियाँ सुनाती रही, गीत गाती रही। आधी रात यमराज साँप बनकर आए। दीयों की जगमग और सोने की चमक से उनकी आँखें चौंधिया गईं, वे भीतर न जा सके। वे उसी ढेर पर बैठकर उसकी कहानियाँ सुनने लगे — और सुनते-सुनते भोर हो गई। मृत्यु की घड़ी निकल गई और यमराज चुपचाप लौट गए। तभी से धनतेरस की रात यम के नाम दीया जलाया जाता है, ताकि घर में अकाल मृत्यु न आए।

A moment of reflection

यह कहानी भाग्य से लड़ने की नहीं, भाग्य के सामने जागते रहने की है। इस बहू के पास न तलवार थी, न कोई मंत्र — बस दीया, धीरज और शब्द थे। उसने मौत को धमकाया नहीं, उसे रोक लिया — रोशनी से, प्रेम से, और एक पल भी न सोने की ज़िद से। आज भी घरों में डर कई रूपों में दस्तक देता है — बीमारी, अनहोनी, चिंता। यह कथा याद दिलाती है कि घर की रक्षा अक्सर वह करता है जो चुपचाप पूरी रात जागता है। धनतेरस पर यम के नाम जलाया गया दीया इसी बहू की याद है — देहरी पर रखा एक वादा कि आज की रात कोई अँधेरे में नहीं जाएगा।

Tradition & source notes

धनतेरस व्रत कथा (यम दीपदान की कथा, स्कंद पुराण परंपरा)

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