The Woman Who Won Against Death
उसे पता था कि शादी के ठीक एक साल बाद उसका पति मरेगा। फिर भी उसने उसी को चुना।
मद्र के राजा अश्वपति अठारह साल की उपासना के बाद देवी सावित्री की कृपा से बेटी पाते हैं — सावित्री। वह इतनी तेजस्वी है कि कोई राजकुमार उससे विवाह का साहस नहीं करता। पिता उसे स्वयं वर ढूँढने भेजते हैं। वह लौटकर बताती है — मैंने सत्यवान को चुना है, जंगल में रहने वाले अंधे, राज्य खो चुके राजा द्युमत्सेन के बेटे को। तभी नारद कहते हैं: सत्यवान गुणी है, पर आज से एक साल बाद उसकी मृत्यु निश्चित है। पिता घबराते हैं, पर सावित्री कहती है — मन एक बार चुन चुका। विवाह होता है। सावित्री वल्कल पहनकर सास-ससुर की सेवा करती है और दिन गिनती है। आख़िरी तीन दिन वह निर्जल व्रत रखती है। उस दिन वह सत्यवान के साथ लकड़ी काटने जंगल जाती है। सत्यवान सिर दर्द से उसकी गोद में गिरता है। यम आते हैं, उसके प्राण निकालकर दक्षिण की ओर चलते हैं। सावित्री पीछे चलती है। यम लौटने को कहते हैं; वह धर्म की बातें करती है। प्रसन्न होकर यम वर देते हैं — ससुर की आँखें, उनका राज्य, पिता को सौ पुत्र, और सत्यवान से सौ पुत्र। अंतिम वर पर यम समझते हैं कि वे हार चुके हैं। वे सत्यवान के प्राण लौटा देते हैं।
A moment of reflection
सावित्री ने मौत से लड़ाई तलवार से नहीं, धैर्य और बुद्धि से जीती। वह रोई नहीं, गिड़गिड़ाई नहीं; उसने यम को धर्म की बातों से इतना प्रसन्न किया कि वे ख़ुद उसके वचन में बँध गए। आज के परिवारों के लिए यह कथा साथ निभाने की है — बीमारी में, ग़रीबी में, उस घड़ी में जब डॉक्टर भी जवाब दे दें। और यह भी कि एक स्त्री का साहस पूरे परिवार को — ससुर की आँखें, राज्य, पिता का वंश — सब कुछ लौटा सकता है। कार्तिक में, जब यम के नाम दीये जलते हैं, सावित्री याद दिलाती है कि प्रेम और धर्म साथ हों तो मौत भी रास्ता देती है।
Tradition & source notes
महाभारत, वन पर्व, पतिव्रता माहात्म्य पर्व (सावित्री-सत्यवान उपाख्यान), अध्याय 277–283
