Poison in the Yamuna
यमुना का पानी पीते ही ग्वाल-बाल वहीं गिर पड़े। फिर कन्हैया कदंब की सबसे ऊँची डाल पर चढ़ गया।
यमुना के एक गहरे दह में कालिय नाग अपने परिवार के साथ आ बसा था। उसके ज़हर से पानी खौलता रहता, ऊपर उड़ते पक्षी गिर पड़ते, किनारे की घास तक सूख गई थी। एक तपती दोपहर, जब बलराम साथ नहीं थे, प्यासे बछड़ों और ग्वाल-बालों ने अनजाने में वही पानी पी लिया और किनारे पर बेसुध गिर पड़े। कृष्ण ने अपनी अमृत भरी दृष्टि से उन्हें जीवित किया, और तय किया — अब यमुना को साफ़ करना होगा। वे किनारे के अकेले हरे कदंब पर चढ़े और काले पानी में कूद गए। कालिय ने उन्हें अपनी कुंडलियों में जकड़ लिया। पूरा व्रज किनारे दौड़ा आया; यशोदा पानी में उतरने को तड़पीं, नंदबाबा बेहाल हुए, पर बलराम शांत रहे — वे जानते थे कि कन्हैया कौन है। कुछ देर बाद कृष्ण कुंडलियों से छूटे, कालिय के फनों पर चढ़े और नाचने लगे। तब नागपत्नियाँ हाथ जोड़कर आईं और पति के प्राण माँगे। कृष्ण ने कालिय को यमुना छोड़कर रमणक द्वीप जाने को कहा, और भरोसा दिया कि उसके फनों पर बने चरण-चिह्न देखकर गरुड़ उसे नहीं छुएँगे। उसी रात किनारे सोए व्रज को जंगल की आग ने घेरा, और कन्हैया उस आग को भी पी गए।
A moment of reflection
यह कथा बच्चों के लिए रोमांच है और बड़ों के लिए एक गहरी बात। कालिय इसलिए भयानक नहीं बना कि वह नाग था — वह इसलिए भयानक बना कि गरुड़ के डर से छिपकर उसने पूरी नदी में ज़हर घोल दिया। कृष्ण ने उसे मारा नहीं; उसका घमंड तोड़ा, उसे नया घर दिया और उसकी रक्षा का वचन भी दिया। नागपत्नियों की विनती बताती है कि सबसे कठोर के घर में भी कोई प्रार्थना करने वाला होता है। आज जब हमारी नदियाँ सचमुच ज़हर ढो रही हैं, यह कथा पूछती है — अपने डर और लालच का ज़हर हम किस पानी में घोल रहे हैं?
Tradition & source notes
श्रीमद्भागवत महापुराण, दशम स्कंध, अध्याय 15–17 (कालिय-दमन)