One Drop, One Demon
उसे मारो तो और बढ़ता है। ख़ून की हर बूँद से एक नया रक्तबीज उठ खड़ा होता है।
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उसे मारो तो और बढ़ता है। ख़ून की हर बूँद से एक नया रक्तबीज उठ खड़ा होता है।
Read the narrativeकैलाश पर एक खेल हुआ — और उस खेल में शिव अपना सब कुछ हार गए।
Read the narrativeशिव ने कहा — अन्न तो माया है। उसी दिन दुनिया से अन्न ग़ायब हो गया।
Read the narrativeभगवान ने बेटा दिया — पर साथ में एक तारीख़ भी दी। सोलहवें जन्मदिन पर उसे मरना था।
Read the narrativeराजा की गोद में मरा हुआ बेटा था, और वह ख़ुद मरने चला था — तभी आसमान से रोशनी उतरी।
Read the narrativeमाँ के जाने के बाद बरसों से एक-दूसरे से न बोले पिता और बेटा उनकी आख़िरी इच्छा पूरी करने बारह ज्योतिर्लिंगों की यात्रा पर निकलते हैं; हर पड़ाव पर स्तोत्र की एक पंक्ति और एक कथा (सोमनाथ में चंद्रमा का श्राप, केदार में पांडव, घृष्णेश्वर में घुश्मा की क्षमा) उनके बीच जमी बर्फ़ को थोड़ा और पिघलाती है।
View story outlineदक्ष के महायज्ञ के द्वार पर सती अकेली खड़ी हैं, जहाँ हर देवता का आसन है पर शिव का नहीं; साथ आए नंदी की आँखों से हम देखते हैं कि एक पिता का अहंकार कैसे बेटी को अग्नि तक, शिव को तांडव तक और ख़ुद दक्ष को बकरे के सिर तक ले जाता है।
View story outlineतारकासुर ने स्वर्ग छीन लिया है और उसे केवल शिव का पुत्र मार सकता है, पर शिव समाधि में हैं; अग्नि, गंगा, सरकंडों का वन और छह कृत्तिकाएँ बारी-बारी उस तेज को सँभालती हैं, और जन्म के कुछ ही दिन बाद एक छह मुखों वाला बालक देवताओं की सेना के आगे खड़ा होता है।
View story outlineकैलाश के भीतरी द्वार पर उबटन से बना एक बालक, माँ की आज्ञा पर अड़ा, ख़ुद महादेव का रास्ता रोक देता है; एक-एक कर नंदी, गण और देवता हारते हैं, त्रिशूल उठता है, और फिर शुरू होती है उस गलती की भरपाई जिसने एक माँ को मौन कर दिया।
View story outlineलिखते-लिखते गणेश की कलम टूट जाती है और शर्त है कि लेखनी एक पल भी रुकी तो वे उठकर चले जाएँगे; उसी क्षण वे अपना दाँत तोड़ लेते हैं, और यहाँ से कहानी व्यास और गणेश की उस अनोखी जोड़ी की बनती है जिसमें एक बिना रुके बोलता है और दूसरा बिना समझे एक अक्षर नहीं लिखता।
View story outlineकुबेर को हराकर लौटते रावण का पुष्पक विमान कैलाश के ऊपर अचानक रुक जाता है, द्वार पर खड़े नंदी को वह बंदर-मुख कहकर हँसता है और नंदी का श्राप हवा में गूँजता है; फिर रावण पूरा पर्वत उठा लेता है, और शिव के एक अँगूठे के दबाव में उसकी भुजाएँ ऐसी दबती हैं कि उसकी चीख से तीनों लोक काँप उठते हैं।
View story outlineआकाश से गरजती गंगा धरती को बहा ले जाने उतरती है और शिव उसे अपनी जटाओं में ऐसे समेट लेते हैं कि वह बरसों रास्ता ढूँढती रह जाती है; नीचे खड़ा राजा भगीरथ अपनी पीढ़ियों का अधूरा वचन लिए फिर से तप में बैठता है, क्योंकि सगर के साठ हज़ार पुत्रों की राख अब भी मुक्ति की राह देख रही है।
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