Three Nights at Death's Door
पिता ने ग़ुस्से में कहा — जा, तुझे मौत को दिया। और बेटा सच में चला गया।
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पिता ने ग़ुस्से में कहा — जा, तुझे मौत को दिया। और बेटा सच में चला गया।
Read the narrativeएक रिटायर्ड पोस्टमास्टर पुश्तैनी घर दोनों बेटों में बाँटकर पहाड़ जाने का ऐलान करता है, और उसी शाम पत्नी धीरे से पूछती है कि क्या यह घर मुझे मौत के डर से छुड़ा देगा; यह प्रश्न उसे वहीं ले जाता है जहाँ याज्ञवल्क्य संन्यास से पहले संपत्ति बाँट रहे थे और मैत्रेयी ने कहा था, 'जिससे मैं अमर न हो सकूँ, उसे लेकर क्या करूँ?'
View story outlineगर्मी की छुट्टियों में बनारस के दादा की वेद-पाठशाला भेजा गया एक चिढ़ा हुआ किशोर पहले ही दिन पूछता है कि जिस किताब को कभी लिखा ही नहीं गया वह हज़ारों साल बची कैसे, और दादा उसे सुबह के घन-पाठ, सामगान के सुरों, यजुर्वेद के यज्ञ और अथर्ववेद की 'धरती मेरी माँ है' वाली प्रार्थना के बीच से चारों वेदों की असली कहानी सुनाते हैं।
View story outlineगुरु गौतम के आश्रम में बालक सत्यकाम से उसका गोत्र पूछा जाता है और वह माँ जबाला की कही बात ज्यों की त्यों दोहरा देता है कि उसे अपने पिता का नाम नहीं पता; गुरु उसी सच के कारण उसे अपनाते हैं और चार सौ दुबली गायें देकर जंगल भेज देते हैं, जहाँ बरसों बाद एक बैल, आग, हंस और जलपक्षी उसे वह सिखाते हैं जो किसी आश्रम में नहीं मिला।
View story outlineराजा जनक की सभा में सोने से मढ़े सींगों वाली हज़ार गायें खड़ी हैं, याज्ञवल्क्य बिना किसी से पूछे शिष्य से उन्हें हाँक ले जाने को कहते हैं, और एक-एक कर सभा के बड़े विद्वान हारकर बैठ जाते हैं; तब गार्गी शांत स्वर में उठती है और कहती है कि वह धनुर्धर की तरह बस दो तीर जैसे प्रश्न पूछेगी।
View story outlineदेवों का राजा इंद्र और असुरों का राजा विरोचन, दो कट्टर शत्रु, एक ही दिन समिधा लेकर प्रजापति के द्वार पहुँचते हैं; बत्तीस बरस की सेवा के बाद पानी के बर्तन में अपनी परछाई देखकर मिले उत्तर से विरोचन संतुष्ट लौट जाता है, पर इंद्र रास्ते में ही रुक जाता है क्योंकि कुछ खटकता है, और यही खटका उसे कुल एक सौ एक बरस तक बार-बार लौटाता है।
View story outlineसरकारी अस्पताल के प्रसव-वार्ड के बाहर पहली बार पिता बनने जा रहा एक घबराया युवक पूरी रात बूढ़े वार्ड-सेवक के साथ बिताता है, जो उसे ऋग्वेद के वे सूक्त सुनाता है जो पूछते हैं कि सृष्टि से पहले क्या था और ईमानदारी से मान लेते हैं कि 'शायद वह भी नहीं जानता', और भोर में बच्चे के पहले रोने के साथ वह गायत्री तक पहुँचता है।
View story outlineबारह बरस गुरुकुल में वेद पढ़कर चौबीस साल का श्वेतकेतु अकड़ में घर लौटता है, और पिता उद्दालक बस एक प्रश्न पूछते हैं कि क्या तुमने वह सीखा जिससे अनसुना सुना हुआ और अनजाना जाना हुआ हो जाता है; यहीं से मिट्टी, बरगद के बीज, पंद्रह दिन के उपवास और पानी में घुली नमक की डली के सहारे एक पिता बेटे का घमंड धीरे-धीरे पिघलाता है।
View story outlineहाईवे के एक पुराने ढाबे पर घर से भागा एक लड़का बूढ़े रसोइए से पूछता है कि ज़िंदगी आख़िर है क्या, और रसोइया उत्तर देने की जगह उसे आटा गूँधने बिठा देता है, ठीक वैसे ही जैसे वरुण ने बेटे भृगु को हर बार 'जाओ, तप करो' कहकर लौटा दिया था, और भृगु पाँच बार लौटकर अन्न से आनंद तक पहुँचा था।
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