Radha-Krishna: The Flute That Never Played Again
Uddhava arrives with a message. Vrindavan teaches him another language of devotion.
चुप गाँव
वृंदावन की सीमा, यमुना वाली राह · ढलती साँझ
उद्धव: बहन... यह गाँव इतना चुप क्यों है? मैंने सुना था, वृंदावन में हवा भी गाती है।
ललिता: गाती थी, उद्धव जी। जब तक कोई बजाने वाला था।
सूत्रधार: कृष्ण को मथुरा गए महीनों बीत चुके थे। आज पहली बार मथुरा से एक रथ लौटा था। पर उसमें कृष्ण नहीं थे।
उद्धव: कृष्ण ने संदेश भेजा है—
ललिता: संदेश... राधा जी से मिलेंगे? उनके पास उनकी बाँसुरी है। बस एक विनती है... बजाने को मत कहिएगा।
उद्धव: बाँसुरी? वह बाँसुरी यहीं छोड़ गए? मथुरा में किसी ने उन्हें बजाते नहीं सुना। मैंने सोचा, राजकाज में भूल गए होंगे।
ललिता: भूले नहीं, उद्धव जी। सौंप गए हैं।
उद्धव: तुम... राधा की सखी हो?
ललिता: ललिता। आप थके होंगे। पहले नंद बाबा के घर चलिए। रात हो रही है, गायें लौट रही हैं।
उद्धव: गायें तो लौट रही हैं, पर ग्वाले गा क्यों नहीं रहे?
ललिता: किसके लिए गाएँ? जिसके पीछे-पीछे गाते थे, वह तो...
उद्धव: मैं सबको समझा दूँगा। कृष्ण ने कहा है, शोक मत करो। वह किसी से दूर नहीं।
ललिता: यह बात आप मैया से कहिएगा। पर धीरे से।
यशोदा: लाला? ...लाला! रथ आया है? मेरा लाला आ गया?
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Tradition & source notes
ब्रह्मवैवर्त पुराण (श्रीकृष्णजन्म खंड — उद्धव-राधा प्रसंग), गर्ग संहिता, गीत गोविंद व ब्रज की भक्ति परंपरा; अक्रूर-आगमन भागवत 10.39, उद्धव-प्रसंग व भ्रमर-गीत भागवत 10.46–47, कुरुक्षेत्र-मिलन भागवत 10.82 से (भागवत में राधा का नाम नहीं आता)। बाँसुरी राधा को सौंपना और कृष्ण का फिर बाँसुरी न बजाना ब्रज की लोक-परंपरा है, ग्रंथ-वचन नहीं।