Radha-Krishna: The Flute That Never Played Again
Uddhava arrives with a message. Vrindavan teaches him another language of devotion.
एक और दूत
यमुना किनारे, बड़ा घाट · अगली सुबह
सूत्रधार: अगली सुबह पूरा ब्रज घाट पर जुट आया। गोपियाँ सीढ़ियों पर बैठ गईं। उद्धव खड़े हुए, और उनकी आवाज़ पानी पर दूर तक गई।
उद्धव: सुनो। ये कृष्ण के शब्द हैं, मेरे नहीं। उन्होंने कहा है, तुम मुझसे कभी अलग नहीं हो सकतीं। जैसे आकाश, हवा, जल और धरती सब प्राणियों में हैं, वैसे ही मैं तुम सबमें हूँ।
विशाखा: सुन रही हैं, उद्धव जी।
उद्धव: और कहा है, मैं दूर इसलिए हूँ कि तुम्हारा मन मुझ पर और टिके। जो पास होता है, उसे आँख देखती है। जो दूर होता है, उसे मन देखता है। मन को मुझमें लगाओ, आँखें मूँदो। मैं भीतर मिलूँगा।
ललिता: बहुत सुंदर बातें हैं।
उद्धव: ऐसी बातें ऋषि बरसों के तप से पाते हैं। तुम्हें तो कृष्ण ने ख़ुद भेजी हैं।
विशाखा: भेजी हैं... हाँ।
उद्धव: तो अब यह उदासी छोड़ो। आँसू पोंछो। वह...
विशाखा: रुकिए, उद्धव जी। देखिए... मथुरा से एक और दूत आ गया।
उद्धव: दूत? कहाँ?
विशाखा: यह। काला भौंरा। बिल्कुल उसी के रंग का।
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Tradition & source notes
ब्रह्मवैवर्त पुराण (श्रीकृष्णजन्म खंड — उद्धव-राधा प्रसंग), गर्ग संहिता, गीत गोविंद व ब्रज की भक्ति परंपरा; अक्रूर-आगमन भागवत 10.39, उद्धव-प्रसंग व भ्रमर-गीत भागवत 10.46–47, कुरुक्षेत्र-मिलन भागवत 10.82 से (भागवत में राधा का नाम नहीं आता)। बाँसुरी राधा को सौंपना और कृष्ण का फिर बाँसुरी न बजाना ब्रज की लोक-परंपरा है, ग्रंथ-वचन नहीं।
