Radha-Krishna: The Flute That Never Played Again
Uddhava arrives with a message. Vrindavan teaches him another language of devotion.
सौंपा है
कदंब के नीचे · कुछ महीने पहले, दोपहर
ललिता: राधा, तुम आई क्यों नहीं? वह तुम्हें ढूँढ रहे थे। सारी भीड़ में बस तुम्हें।
राधा: जानती हूँ।
ललिता: जानती हो? तो फिर?
राधा: विदा उसे करते हैं, ललिता, जो जा रहा हो।
ललिता: वह चले गए, राधा। रथ मथुरा की सड़क पर है। मैया बेसुध होकर गिर पड़ीं।
राधा: मैया...? अब कैसी हैं?
ललिता: विशाखा के पास हैं। होश आ गया है।
राधा: साँझ को मैं उनके पास जाऊँगी। रात भर उनके पास रहूँगी।
ललिता: और यह... यह उनकी बाँसुरी है ना? वह इसे भूल गए?
राधा: भूले नहीं।
ललिता: तो छोड़ गए?
राधा: छोड़ी भी नहीं, ललिता। सौंपी है।
ललिता: सौंपी... कब? कल साँझ तक तो यह उनकी कमर में खुँसी थी। मैंने ख़ुद देखी थी।
राधा: कल रात। आधी रात को।
ललिता: आधी रात को? वह यहाँ आए थे?
राधा: यहीं। इसी कदंब के नीचे। मुझे नींद नहीं आ रही थी, ललिता। लगा, जैसे किसी ने पुकारा हो। मैं उठी और चली आई।
राधा: और वह यहाँ बैठे थे, चुपचाप। बाँसुरी हाथ में थी, पर होंठों से दूर। जैसे...
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Tradition & source notes
ब्रह्मवैवर्त पुराण (श्रीकृष्णजन्म खंड — उद्धव-राधा प्रसंग), गर्ग संहिता, गीत गोविंद व ब्रज की भक्ति परंपरा; अक्रूर-आगमन भागवत 10.39, उद्धव-प्रसंग व भ्रमर-गीत भागवत 10.46–47, कुरुक्षेत्र-मिलन भागवत 10.82 से (भागवत में राधा का नाम नहीं आता)। बाँसुरी राधा को सौंपना और कृष्ण का फिर बाँसुरी न बजाना ब्रज की लोक-परंपरा है, ग्रंथ-वचन नहीं।
