Radha-Krishna: The Flute That Never Played Again
Uddhava arrives with a message. Vrindavan teaches him another language of devotion.
मथानी की आवाज़
नंद बाबा का आँगन · रात का आख़िरी पहर
उद्धव: माँ, वह राजमहल है। तरह-तरह के पकवान बनते हैं—
यशोदा: बनते होंगे, बेटा। मैंने पूछा, वह खाता है? वह तो बिना मनाए कौर नहीं उठाता था। वहाँ उसे कौन मनाता है?
उद्धव: मनाता...? यह तो... मैंने कभी देखा नहीं, माँ।
यशोदा: और रात को? अँधेरे में उसे नींद नहीं आती थी। मैं लोरी गाती थी, तब सोता था।
उद्धव: माँ, उनका संदेश है। मैं तुमसे कभी दूर नहीं। जो मुझे याद करता है, मैं उसी के पास हूँ।
यशोदा: यह तो मैं जानती हूँ, बेटा। पास है, तभी तो हर आहट पर देहरी तक दौड़ जाती हूँ।
नंद बाबा: रात बीत गई, यशोदा। इसे थोड़ा सो लेने दो।
यशोदा: हाँ... हाँ। दही मथने का समय भी हो गया।
सूत्रधार: यशोदा मटकी के पास बैठीं और मथानी की रस्सी खींची। फिर एक-एक कर, गाँव के हर घर से वही आवाज़ उठने लगी।
उद्धव: बाबा... ये सब क्या गा रही हैं? हर घर से एक ही धुन—
नंद बाबा: उसी का नाम, बेटा। ब्रज में अब दही भी उसी के नाम से मथता है।
उद्धव: पर यमुना की ओर वाले छोर से कोई आवाज़ नहीं आती।
नंद बाबा: वहाँ राधा का आँगन है, बेटा।
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Tradition & source notes
ब्रह्मवैवर्त पुराण (श्रीकृष्णजन्म खंड — उद्धव-राधा प्रसंग), गर्ग संहिता, गीत गोविंद व ब्रज की भक्ति परंपरा; अक्रूर-आगमन भागवत 10.39, उद्धव-प्रसंग व भ्रमर-गीत भागवत 10.46–47, कुरुक्षेत्र-मिलन भागवत 10.82 से (भागवत में राधा का नाम नहीं आता)। बाँसुरी राधा को सौंपना और कृष्ण का फिर बाँसुरी न बजाना ब्रज की लोक-परंपरा है, ग्रंथ-वचन नहीं।