Radha-Krishna: The Flute That Never Played Again
Uddhava arrives with a message. Vrindavan teaches him another language of devotion.
अक्रूर नाम
नंद बाबा का द्वार · कुछ महीने पहले, भोर
सूत्रधार: यशोदा को उत्तर नहीं मिला। भोर हुई तो नंद बाबा के द्वार पर रथ जुता खड़ा था। ग्वाले छकड़ों में मटकियाँ लाद रहे थे, और रथ के चारों ओर गोपियाँ थीं।
विशाखा: अक्रूर जी... आपका नाम अक्रूर है ना? जो क्रूर न हो?
अक्रूर: हाँ, बेटी।
विशाखा: तो फिर यह कैसा काम है? हमारी आँखों का तारा ले जा रहे हैं, और नाम अक्रूर।
अक्रूर: बेटी, मैं तो बस राजा की आज्ञा—
ललिता: हम आपको दोष नहीं देतीं, अक्रूर जी। विधाता ने ही लिखा होगा। बस इतना बता दीजिए... मथुरा की नगर-नारियाँ उसे देखेंगी, तो क्या वह हम गाँव वालियों को याद रखेगा?
अक्रूर: मैं... मैं क्या कहूँ, बेटी।
बलराम: अक्रूर चाचा, सूरज चढ़ने लगा है। अब चलना होगा।
अक्रूर: माताओ, बहनो... मैं हाथ जोड़ता हूँ। मुझे क्षमा करना। कंस का दूत बनकर आया था, पर आज लगता है, जैसे सबसे बड़ा अपराधी मैं ही हूँ।
विशाखा: क्षमा तो कर देंगी, अक्रूर जी। पर रथ आगे नहीं जाने देंगी।
अक्रूर: अरे... यह क्या कर रही हो, बेटियो? उठो... रथ के आगे से उठो!
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Tradition & source notes
ब्रह्मवैवर्त पुराण (श्रीकृष्णजन्म खंड — उद्धव-राधा प्रसंग), गर्ग संहिता, गीत गोविंद व ब्रज की भक्ति परंपरा; अक्रूर-आगमन भागवत 10.39, उद्धव-प्रसंग व भ्रमर-गीत भागवत 10.46–47, कुरुक्षेत्र-मिलन भागवत 10.82 से (भागवत में राधा का नाम नहीं आता)। बाँसुरी राधा को सौंपना और कृष्ण का फिर बाँसुरी न बजाना ब्रज की लोक-परंपरा है, ग्रंथ-वचन नहीं।