Radha-Krishna: The Flute That Never Played Again
Uddhava arrives with a message. Vrindavan teaches him another language of devotion.
रणछोड़
मथुरा का परकोटा · बरसों बाद, साँझ
सूत्रधार: उद्धव की आँखें फिर भर आईं। पर मथुरा को रोने का समय नहीं मिला। बरस बीतने लगे, और जरासंध ने मथुरा पर चढ़ाई की। एक बार, दो बार... सत्रह बार। हर बार हारा, हर बार नई सेना लेकर लौटा।
बलराम: कन्हैया, वह फिर आ रहा है। अठारहवीं बार। और इस बार पश्चिम से कालयवन की सेना भी।
श्रीकृष्ण: जानता हूँ, दाऊ। हम लड़ेंगे, जीतेंगे भी। पर हर युद्ध में मथुरा के लोग मरते हैं। बच्चे डर के साये में बड़े हो रहे हैं।
बलराम: तो क्या करें? भाग जाएँ? लोग हँसेंगे, कहेंगे रण छोड़कर भागे।
श्रीकृष्ण: कहने दो, दाऊ। रणछोड़ कहलाऊँगा, तो भी चलेगा। मेरी प्रजा जीती रहे।
बलराम: पर जाएँगे कहाँ?
श्रीकृष्ण: पश्चिम में, समुद्र के बीच। वहाँ एक नगर बसाएँगे, जहाँ कोई सेना न पहुँच सके। द्वारका।
बलराम: समुद्र... कन्हैया, वह तो ब्रज से महीनों का रास्ता है। मैया से, बाबा से... और दूर हो जाएँगे।
श्रीकृष्ण: हाँ, दाऊ।
बलराम: और एक बात। मथुरा आकर तूने एक बार भी बाँसुरी नहीं उठाई। मैंने देखा है। द्वारका में उठाएगा?
श्रीकृष्ण: नहीं, दाऊ। वह जिसके पास है, वहीं ठीक है। ...चलो। कल से द्वारका की नींव पड़ेगी।
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Tradition & source notes
ब्रह्मवैवर्त पुराण (श्रीकृष्णजन्म खंड — उद्धव-राधा प्रसंग), गर्ग संहिता, गीत गोविंद व ब्रज की भक्ति परंपरा; अक्रूर-आगमन भागवत 10.39, उद्धव-प्रसंग व भ्रमर-गीत भागवत 10.46–47, कुरुक्षेत्र-मिलन भागवत 10.82 से (भागवत में राधा का नाम नहीं आता)। बाँसुरी राधा को सौंपना और कृष्ण का फिर बाँसुरी न बजाना ब्रज की लोक-परंपरा है, ग्रंथ-वचन नहीं।