Radha-Krishna: The Flute That Never Played Again
Uddhava arrives with a message. Vrindavan teaches him another language of devotion.
भौंरे से बातें
यमुना किनारे, बड़ा घाट · सुबह
विशाखा: ओ भौंरे... तुझे भी उसी ने भेजा है? उसी के रंग का है, उसी जैसा गुनगुनाता है।
उद्धव: देवी, यह तो बस एक भौंरा है—
विशाखा: जानती हूँ, उद्धव जी। पर उससे कुछ कहना हो, तो इससे कहना आसान है। आपसे कहें, तो आप शास्त्र खोल देते हैं।
ललिता: रहने दीजिए, उद्धव जी। बस सुन लीजिए।
विशाखा: सुन, भौंरे। मेरे पैर मत छू। तेरी मूँछों पर किसी और की माला का पराग लगा है। तू भी उसी जैसा है... एक फूल का रस लिया, और उड़ गया अगले पर।
विशाखा: देखो, बुरा मान गया। उड़ गया। ...पर फिर लौट आया।
ललिता: वह भी ऐसा ही था। रूठता था, फिर लौट आता था।
विशाखा: भौंरे, उसकी बातें हमसे मत कर। मथुरा में उसकी नई सखियाँ होंगी, उन्हें सुना। हमने तो उसके लिए घर, गाँव, सब कुछ भुला दिया था।
ललिता: फिर भी... एक बात पूछ लो, विशाखा।
विशाखा: हाँ। भौंरे, बता... वह कभी अपनी गायों को याद करता है? यमुना को? इस कदंब को? हमें?
सूत्रधार: भौंरा चुप था। घाट चुप था। और तभी, बिना चाहे, उद्धव के मुँह से निकल पड़ा।
उद्धव: करते हैं—
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Tradition & source notes
ब्रह्मवैवर्त पुराण (श्रीकृष्णजन्म खंड — उद्धव-राधा प्रसंग), गर्ग संहिता, गीत गोविंद व ब्रज की भक्ति परंपरा; अक्रूर-आगमन भागवत 10.39, उद्धव-प्रसंग व भ्रमर-गीत भागवत 10.46–47, कुरुक्षेत्र-मिलन भागवत 10.82 से (भागवत में राधा का नाम नहीं आता)। बाँसुरी राधा को सौंपना और कृष्ण का फिर बाँसुरी न बजाना ब्रज की लोक-परंपरा है, ग्रंथ-वचन नहीं।
