Radha-Krishna: The Flute That Never Played Again
Uddhava arrives with a message. Vrindavan teaches him another language of devotion.
कल रात बता दिया था
यमुना किनारे, बड़ा घाट · सुबह
उद्धव: मुझे? राधा ने ख़ुद बुलाया है? सच कह रहे हो, मंगलू?
मंगलू: सच्ची! धौली की क़सम। ललिता दीदी ने कहा, दौड़कर जा, उद्धव भैया को बुला ला।
यमुना की राह · साँझ
सूत्रधार: उस दिन साँझ बड़ी देर से आई। सूरज ढलते ही मंगलू उन्हें लेने आ पहुँचा।
मंगलू: पता है, राधा दीदी हर साँझ बाँसुरी को कपड़े से पोंछती हैं। एक दिन मैंने पूछा, दीदी, बजाओगी? वह हँस दीं। बोलीं, यह बजती नहीं, मंगलू। सुनती है।
उद्धव: सुनती है?
मंगलू: मुझे भी समझ नहीं आया। तुम ज्ञानी हो, तुम समझ लेना।
उद्धव: आजकल मुझे भी कम ही समझ आता है, मंगलू।
कदंब के नीचे · ढलती साँझ
सूत्रधार: कदंब के नीचे एक दीया जल रहा था। राधा उसी पत्थर पर बैठी थीं। गोद में, पीले कपड़े में लिपटी बाँसुरी।
राधा: मंगलू, अब गायें घर ले जाओ। अँधेरा हो रहा है, मैया राह देखती होंगी।
मंगलू: जाता हूँ, दीदी। चल धौली, चल!
उद्धव: देवी... प्रणाम। मैं उद्धव हूँ। मथुरा से—
राधा: आइए, उद्धव जी। बैठिए। मुझे पता था, आप आज आएँगे।
उद्धव: ललिता ने बताया होगा।
राधा: नहीं। ललिता को तो मैंने बाद में भेजा। मुझे कल रात ही बता दिया गया था।
उद्धव: कल रात? किसने?
राधा: उन्होंने।
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Tradition & source notes
ब्रह्मवैवर्त पुराण (श्रीकृष्णजन्म खंड — उद्धव-राधा प्रसंग), गर्ग संहिता, गीत गोविंद व ब्रज की भक्ति परंपरा; अक्रूर-आगमन भागवत 10.39, उद्धव-प्रसंग व भ्रमर-गीत भागवत 10.46–47, कुरुक्षेत्र-मिलन भागवत 10.82 से (भागवत में राधा का नाम नहीं आता)। बाँसुरी राधा को सौंपना और कृष्ण का फिर बाँसुरी न बजाना ब्रज की लोक-परंपरा है, ग्रंथ-वचन नहीं।