Radha-Krishna: The Flute That Never Played Again
Uddhava arrives with a message. Vrindavan teaches him another language of devotion.
इसीलिए भेजा था
मथुरा का राजमहल, कृष्ण का कक्ष · रात
उद्धव: उन्होंने कोई संदेश नहीं भेजा, प्रभु। बस इतना कहा... बाँसुरी सँभली हुई है।
सूत्रधार: कृष्ण खिड़की की ओर मुड़ गए। उत्तर की ओर। दीये की लौ में उनकी आँखें भीगी दिखीं।
उद्धव: प्रभु... आपकी आँखें...
श्रीकृष्ण: यमुना की हवा है, उद्धव। कभी-कभी यहाँ तक आ जाती है।
उद्धव: और एक बात माँ ने पूछी थी। राधा जी ने भी। आप... ठीक से खाते हैं?
श्रीकृष्ण: यह बात? ...लाओ, माँ का माखन लाओ।
श्रीकृष्ण: वही। ठीक वही स्वाद। ...लो, अब ठीक से खा लिया, उद्धव। जाकर बता देना।
उद्धव: प्रभु, एक बात पूछूँ? आप तो सब जानते हैं। फिर आपने मुझे ही क्यों भेजा? संदेश तो कोई भी दूत ले जा सकता था।
श्रीकृष्ण: संदेश ले जाने के लिए नहीं भेजा था, उद्धव।
उद्धव: तो फिर?
श्रीकृष्ण: तुम्हारे पास ज्ञान था, पर उसमें रस नहीं था। मैं जानता था, ब्रज तुम्हें वह सिखा देगा, जो मैं कहकर नहीं सिखा सकता। इसीलिए तुम्हें भेजा था।
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Tradition & source notes
ब्रह्मवैवर्त पुराण (श्रीकृष्णजन्म खंड — उद्धव-राधा प्रसंग), गर्ग संहिता, गीत गोविंद व ब्रज की भक्ति परंपरा; अक्रूर-आगमन भागवत 10.39, उद्धव-प्रसंग व भ्रमर-गीत भागवत 10.46–47, कुरुक्षेत्र-मिलन भागवत 10.82 से (भागवत में राधा का नाम नहीं आता)। बाँसुरी राधा को सौंपना और कृष्ण का फिर बाँसुरी न बजाना ब्रज की लोक-परंपरा है, ग्रंथ-वचन नहीं।