ॐBhakti Aanganभक्ति आंगन
Shri Krishna

Radha-Krishna: The Flute That Never Played Again

Uddhava arrives with a message. Vrindavan teaches him another language of devotion.

Original Hindi text48 chapters
37 / 48
Chapter 37

सूर्यग्रहण

कदंब के नीचे · रात उतरते

यशोदा: द्वारका की? लाला ठीक तो है?

नंद बाबा: ठीक है, ठीक है। सुनो। तीर्थ को जाते कुछ साधु आए हैं। कहते हैं, इस बरस पूरा सूर्यग्रहण पड़ेगा। सारे देश के राजा, सारी प्रजा कुरुक्षेत्र में स्नान करने जा रही है।

ललिता: कुरुक्षेत्र...

नंद बाबा: और द्वारका से यादव भी आ रहे हैं। वसुदेव जी, बलराम... और कृष्ण भी।

यशोदा: कृष्ण... वह आ रहा है? कुरुक्षेत्र?

नंद बाबा: हाँ, यशोदा। और हम भी चलेंगे। सारा ब्रज चलेगा। गाड़ियाँ जोड़ो, बैल तैयार करो। इस बार उसे देखकर ही लौटूँगा।

यशोदा: बरसों बाद... पहचानेगा मुझे? मेरे बाल तो सफ़ेद हो गए।

नंद बाबा: तू उसे पहचानेगी या नहीं, यह सोच। अब राजा है। भारी मुकुट होगा, लंबा कद होगा। पर आँखें वही होंगी, यशोदा। आँखें नहीं बदलतीं।

ललिता: राधा! सुना? हम कुरुक्षेत्र चल रही हैं! तुम उन्हें देखोगी!

सूत्रधार: सब राधा की ओर मुड़े। वह बाँसुरी को कपड़े में लपेट रही थीं, धीरे-धीरे, जैसे कुछ सुना ही न हो।

राधा: मैं नहीं जाऊँगी, ललिता।

All chapters (48)
1. चुप गाँव2. पीला पटुका3. रात भर की बातें4. मथानी की आवाज़5. मंगलू6. ख़ाली डाल7. एक पहर की बात8. द्वार के पीछे से9. मेरा काम हो गया10. संदेश या वह?11. धूल में पैरों के निशान12. धनुष-यज्ञ का न्योता13. आधी रात की आहट14. अक्रूर नाम15. भीड़ में ढूँढती आँखें16. उड़ती धूल17. गोद में बाँसुरी18. सौंपा है19. आज नहीं20. और अगर...21. कभी गया ही नहीं22. एक और दूत23. भौंरे से बातें24. एक ही मन25. कल रात बता दिया था26. जो भीतर है27. आँखों की आदत28. एक काम बाकी है29. काश मैं बेल होता30. गायें ऊपर देखती हैं31. इसीलिए भेजा था32. रणछोड़33. महारानी का सवाल34. वह वृंदावन में है35. दीया थकता है क्या36. देहरी का माखन37. सूर्यग्रहण38. एक बाँसुरी लेकर39. टीले के उस पार40. गाय का निशान41. मैया42. सखियाँ43. महारानी झुकीं44. थके लगते हो45. हवा ने बताया46. पहले दिन से47. जो बजी नहीं48. कदंब की धुन
Tradition & source notes

ब्रह्मवैवर्त पुराण (श्रीकृष्णजन्म खंड — उद्धव-राधा प्रसंग), गर्ग संहिता, गीत गोविंद व ब्रज की भक्ति परंपरा; अक्रूर-आगमन भागवत 10.39, उद्धव-प्रसंग व भ्रमर-गीत भागवत 10.46–47, कुरुक्षेत्र-मिलन भागवत 10.82 से (भागवत में राधा का नाम नहीं आता)। बाँसुरी राधा को सौंपना और कृष्ण का फिर बाँसुरी न बजाना ब्रज की लोक-परंपरा है, ग्रंथ-वचन नहीं।

Back to stories
HomeDiya SevaPujasStoriesMy bookings