Radha-Krishna: The Flute That Never Played Again
Uddhava arrives with a message. Vrindavan teaches him another language of devotion.
आधी रात की आहट
नंद बाबा का आँगन · कुछ महीने पहले, रात
यशोदा: लाला... इतनी जल्दी? तूने मुझसे पूछा भी नहीं।
श्रीकृष्ण: मैया, धनुष-यज्ञ है। राजा का बुलावा है। बाबा भी साथ होंगे, सारे ग्वाले होंगे।
यशोदा: बाबा तो लौट आएँगे। और तू?
श्रीकृष्ण: मैं भी आऊँगा, मैया।
यशोदा: कब?
बलराम: मैया, मथुरा में बहुत बड़ा काम है। उसे अधूरा छोड़कर हम यहाँ चैन से गाय नहीं चरा सकते।
यशोदा: काम... तुम दोनों इतने बड़े कब हो गए, दाऊ? कल तक तो यह ऊखल से बँधा था।
नंद बाबा: यशोदा... बच्चों को रोको मत। जो विधाता ने लिखा है, वही होगा।
सूत्रधार: ख़बर रातों-रात पूरे गाँव में फैल गई। गोपियाँ अपने घरों में जागती रहीं। उस रात ब्रज में किसी ने दीया नहीं बुझाया।
नंद बाबा का आँगन · आधी रात
यशोदा: लाला? इतनी रात को कहाँ जा रहा है?
श्रीकृष्ण: अभी आता हूँ, मैया। बस एक काम बाकी है।
यशोदा: तेरी बाँसुरी... इसे साथ ले जा रहा है? इतनी रात को किसे सुनाएगा?
श्रीकृष्ण: आज सुनाने नहीं जा रहा, मैया। आज... देने जा रहा हूँ।
यशोदा: देने...? लाला? किसे?
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Tradition & source notes
ब्रह्मवैवर्त पुराण (श्रीकृष्णजन्म खंड — उद्धव-राधा प्रसंग), गर्ग संहिता, गीत गोविंद व ब्रज की भक्ति परंपरा; अक्रूर-आगमन भागवत 10.39, उद्धव-प्रसंग व भ्रमर-गीत भागवत 10.46–47, कुरुक्षेत्र-मिलन भागवत 10.82 से (भागवत में राधा का नाम नहीं आता)। बाँसुरी राधा को सौंपना और कृष्ण का फिर बाँसुरी न बजाना ब्रज की लोक-परंपरा है, ग्रंथ-वचन नहीं।
