Radha-Krishna: The Flute That Never Played Again
Uddhava arrives with a message. Vrindavan teaches him another language of devotion.
एक ही मन
यमुना किनारे, बड़ा घाट · सुबह
उद्धव: करते हैं। नाम नहीं लेते। पर हर साँझ, जब सूरज ढलता है, वह महल की खिड़की से इसी दिशा में देखते हैं। उस घड़ी कोई कुछ कहे, तो सुनते नहीं।
विशाखा: यह आपने पहले क्यों नहीं बताया, उद्धव जी?
उद्धव: मुझे लगा... यह मोह की बात है। बताने लायक नहीं।
ललिता: जो बात आपको छोटी लगी, वही तो हम महीनों से सुनना चाहती थीं।
उद्धव: पर देवियो... आत्मा न आती है, न जाती है। तुम मन को साधो, योग करो—
ललिता: उद्धव जी, आत्मा की बात आप जानें। हम तो इतना जानती हैं... मन एक ही था। वह उसके साथ चला गया। अब योग किस मन से करें?
उद्धव: किस मन से...
विशाखा: आप ज्ञानी हैं, उद्धव जी। पर ज्ञान उसके काम आता है, जिसका मन अपने पास हो।
उद्धव: फिर तो मुझे राधा से ही मिलना होगा। वही बता सकती हैं कि यह कौन-सा...
मंगलू: उद्धव भैया! उद्धव भैया! राधा दीदी ने बुलाया है! कहा है, साँझ को कदंब के नीचे आ जाना!
All chapters (48)
Tradition & source notes
ब्रह्मवैवर्त पुराण (श्रीकृष्णजन्म खंड — उद्धव-राधा प्रसंग), गर्ग संहिता, गीत गोविंद व ब्रज की भक्ति परंपरा; अक्रूर-आगमन भागवत 10.39, उद्धव-प्रसंग व भ्रमर-गीत भागवत 10.46–47, कुरुक्षेत्र-मिलन भागवत 10.82 से (भागवत में राधा का नाम नहीं आता)। बाँसुरी राधा को सौंपना और कृष्ण का फिर बाँसुरी न बजाना ब्रज की लोक-परंपरा है, ग्रंथ-वचन नहीं।
