Radha-Krishna: The Flute That Never Played Again
Uddhava arrives with a message. Vrindavan teaches him another language of devotion.
धनुष-यज्ञ का न्योता
नंद बाबा का आँगन · कुछ महीने पहले, रात
सूत्रधार: कृष्ण और बलराम ख़ुद दौड़कर अक्रूर को लिवा लाए। उन्हें गले लगाया, पाँव धुलाए, भोजन कराया। पर अक्रूर की आँखें बार-बार भर आती थीं।
श्रीकृष्ण: चाचा, आप तो ऐसे काँप रहे हैं, जैसे कोई बुरी ख़बर लाए हों। मथुरा में सब कुशल तो है?
अक्रूर: कुशल कहाँ, कृष्ण। कंस ने धनुष-यज्ञ रखा है। सारे ब्रज को न्योता है। पर असल में वह तुम दोनों को बुला रहा है। रंगभूमि में मतवाला हाथी है, बड़े-बड़े पहलवान हैं। वह तुम्हें मरवाना चाहता है।
बलराम: तो चलेंगे। बरसों से वह यहाँ राक्षस भेज रहा है। अब हम ख़ुद जाकर उत्तर देंगे।
अक्रूर: बलराम, तुम समझे नहीं—
श्रीकृष्ण: समझ गए, चाचा। और एक बात आपने नहीं कही। कारागार में मेरी माँ देवकी और पिता वसुदेव भी तो हैं।
अक्रूर: तुम... जानते हो?
श्रीकृष्ण: जानता हूँ। बहुत दिन से उनकी पुकार सुन रहा था।
नंद बाबा: तो ठीक है। कल सुबह सारे ग्वाले छकड़ों में दूध, दही, माखन भरकर मथुरा चलेंगे। राजा का न्योता है, ख़ाली हाथ नहीं जाएँगे।
श्रीकृष्ण: हाँ, बाबा। और मैं और दाऊ, अक्रूर चाचा के रथ से। कल भोर होते ही।
यशोदा: कल...?
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Tradition & source notes
ब्रह्मवैवर्त पुराण (श्रीकृष्णजन्म खंड — उद्धव-राधा प्रसंग), गर्ग संहिता, गीत गोविंद व ब्रज की भक्ति परंपरा; अक्रूर-आगमन भागवत 10.39, उद्धव-प्रसंग व भ्रमर-गीत भागवत 10.46–47, कुरुक्षेत्र-मिलन भागवत 10.82 से (भागवत में राधा का नाम नहीं आता)। बाँसुरी राधा को सौंपना और कृष्ण का फिर बाँसुरी न बजाना ब्रज की लोक-परंपरा है, ग्रंथ-वचन नहीं।
