Radha-Krishna: The Flute That Never Played Again
Uddhava arrives with a message. Vrindavan teaches him another language of devotion.
रात भर की बातें
नंद बाबा का आँगन · आधी रात
नंद बाबा: सुबह कौवे खा जाते हैं, उद्धव। साँझ को वह फिर रख देती है। मैं कुछ नहीं कहता।
उद्धव: बाबा, आप सबको इतना शोक नहीं करना चाहिए। कृष्ण कोई साधारण बालक नहीं—
नंद बाबा: जानता हूँ, बेटा। गर्ग जी ने नामकरण के दिन ही कह दिया था। पूतना, कालिया, गोवर्धन... सब देखा है इन आँखों ने। पर पहले यह बताओ, उसने कंस को कैसे मारा? कहीं चोट तो नहीं आई?
उद्धव: एक खरोंच तक नहीं, बाबा। रंगभूमि में हाथी, फिर पहलवान, फिर कंस। सब पल भर में। अब मथुरा में उग्रसेन राजा हैं। देवकी और वसुदेव कारागार से छूट गए हैं।
नंद बाबा: देवकी... उसकी अपनी माँ। अच्छा हुआ। वह बेचारी कितने बरस रोई होगी।
नंद बाबा: उद्धव... वह कभी अपनी गायों की बात करता है? श्रीदामा की? उस कदंब की?
उद्धव: सभा में बहुत काम रहता है, बाबा। पर हाँ... कभी-कभी बात करते-करते चुप हो जाते हैं। तब लगता है, कहीं दूर हैं।
नंद बाबा: वहीं होगा। यहीं।
सूत्रधार: नंद बाबा बार-बार वही बातें पूछते, और उद्धव हर बार नया जवाब ढूँढते। दीया आधा जल चुका था।
यशोदा: उद्धव... एक बात मैं भी पूछूँ? मेरा लाला... वहाँ ठीक से खाता है?
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Tradition & source notes
ब्रह्मवैवर्त पुराण (श्रीकृष्णजन्म खंड — उद्धव-राधा प्रसंग), गर्ग संहिता, गीत गोविंद व ब्रज की भक्ति परंपरा; अक्रूर-आगमन भागवत 10.39, उद्धव-प्रसंग व भ्रमर-गीत भागवत 10.46–47, कुरुक्षेत्र-मिलन भागवत 10.82 से (भागवत में राधा का नाम नहीं आता)। बाँसुरी राधा को सौंपना और कृष्ण का फिर बाँसुरी न बजाना ब्रज की लोक-परंपरा है, ग्रंथ-वचन नहीं।