Radha-Krishna: The Flute That Never Played Again
Uddhava arrives with a message. Vrindavan teaches him another language of devotion.
जो भीतर है
कदंब के नीचे · साँझ ढलते
उद्धव: उन्होंने? पर देवी, वह तो मथुरा में हैं। कल रात तो वह राजसभा में—
राधा: मथुरा कहाँ है, उद्धव जी? मुझे तो कभी दूर नहीं लगा।
उद्धव: आपने सपना देखा होगा।
राधा: हो सकता है। आप ज्ञानी हैं, आप ही जानें, सपना क्या है और जागना क्या। पर पहले एक बात बताइए... वह ठीक से खाते तो हैं ना?
उद्धव: यही बात माँ ने पूछी थी। मैं उन्हें भी नहीं बता पाया।
राधा: कोई बात नहीं। आप सभा में रहते हैं, रसोई में नहीं।
उद्धव: देवी, मैं उनका संदेश लाया हूँ। उन्होंने कहा है, वह आपके भीतर हैं। आँखें मूँदिए, मन को भीतर ले जाइए, ध्यान कीजिए। वह वहीं मिलेंगे। बाहर ढूँढने से बस दुख मिलता है।
राधा: भीतर... हाँ।
उद्धव: तो फिर रोज़ साँझ यहाँ बैठना? यह राह देखना? यह तो उन्हें बाहर ढूँढना हुआ, देवी।
राधा: उद्धव जी, एक सवाल पूछूँ? बुरा तो नहीं मानेंगे?
उद्धव: पूछिए। इसीलिए तो आया हूँ।
राधा: जो भीतर है... उसे मैं बाहर कैसे ढूँढूँ? मैं तो उन्हें कभी ढूँढ ही नहीं रही थी।
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Tradition & source notes
ब्रह्मवैवर्त पुराण (श्रीकृष्णजन्म खंड — उद्धव-राधा प्रसंग), गर्ग संहिता, गीत गोविंद व ब्रज की भक्ति परंपरा; अक्रूर-आगमन भागवत 10.39, उद्धव-प्रसंग व भ्रमर-गीत भागवत 10.46–47, कुरुक्षेत्र-मिलन भागवत 10.82 से (भागवत में राधा का नाम नहीं आता)। बाँसुरी राधा को सौंपना और कृष्ण का फिर बाँसुरी न बजाना ब्रज की लोक-परंपरा है, ग्रंथ-वचन नहीं।
