Radha-Krishna: The Flute That Never Played Again
Uddhava arrives with a message. Vrindavan teaches him another language of devotion.
और अगर...
कदंब के नीचे · अक्रूर के आने वाली रात
श्रीकृष्ण: क्यों, राधा?
राधा: यह तुम्हारी साँस है। गायें इसी से लौटती हैं, ग्वाले इसी से जागते हैं। इसे मुझे दे दोगे, तो वहाँ किससे बोलोगे?
श्रीकृष्ण: वहाँ बोलना नहीं है, राधा। वहाँ लड़ना है। रंगभूमि में, राजसभा में। वहाँ इसकी जगह नहीं।
राधा: और तुम्हारी? तुम्हारी जगह है वहाँ?
श्रीकृष्ण: मेरी जगह वहाँ है, जहाँ धर्म को मेरी ज़रूरत है। पर मेरा मन... उसकी जगह यहीं है। इसलिए इसे यहीं छोड़ रहा हूँ।
राधा: अपना मन मुझे सौंप रहे हो?
श्रीकृष्ण: वह तो बहुत पहले सौंप चुका। यह बस उसका निशान है।
राधा: ...ठीक है। रख लेती हूँ। पर बजाऊँगी नहीं।
श्रीकृष्ण: बजाना भी मत। बस सँभालना। मेरे लौटने तक।
राधा: और एक बात। कल सुबह मैं रथ के पास नहीं आऊँगी।
श्रीकृष्ण: क्यों?
राधा: तुम्हें जाते देखकर रो पड़ी, तो तुम्हारे पैर रुक जाएँगे। और मथुरा को तुम्हारी ज़रूरत है।
श्रीकृष्ण: ...तुम मुझसे ज़्यादा जानती हो, राधा।
सूत्रधार: देर तक दोनों चुप रहे। फिर राधा ने वह पूछा, जो सारी रात उनके होंठों पर रुका था।
राधा: कान्हा... और अगर तुम... न लौटे तो?
All chapters (48)
Tradition & source notes
ब्रह्मवैवर्त पुराण (श्रीकृष्णजन्म खंड — उद्धव-राधा प्रसंग), गर्ग संहिता, गीत गोविंद व ब्रज की भक्ति परंपरा; अक्रूर-आगमन भागवत 10.39, उद्धव-प्रसंग व भ्रमर-गीत भागवत 10.46–47, कुरुक्षेत्र-मिलन भागवत 10.82 से (भागवत में राधा का नाम नहीं आता)। बाँसुरी राधा को सौंपना और कृष्ण का फिर बाँसुरी न बजाना ब्रज की लोक-परंपरा है, ग्रंथ-वचन नहीं।
