Radha-Krishna: The Flute That Never Played Again
Uddhava arrives with a message. Vrindavan teaches him another language of devotion.
टीले के उस पार
कुरुक्षेत्र की राह, बैलगाड़ियों का पड़ाव · रात
सूत्रधार: और सच में, राधा की गोद में वही पीला कपड़ा था। ब्रज की गाड़ियाँ कुरुक्षेत्र की राह पर थीं।
यशोदा: नींद नहीं आ रही, राधा। तू भी जाग रही है?
राधा: जी, मैया।
यशोदा: सोच रही हूँ, वह मुझे देखकर क्या कहेगा। मैया कहेगा या माता? राजा लोग तो माता कहते हैं ना?
राधा: मैया ही कहेंगे। और कहने से पहले माखन माँगेंगे।
यशोदा: माखन तो रख लिया है। तीन मटकियाँ। तेरे बाबा बोले, पगली, वहाँ राजाओं के भंडार होंगे। मैंने कहा, उनमें मेरे हाथ का थोड़े होगा।
नंद बाबा: सो जाओ, दोनों। भोर से पहले चलना है।
यशोदा: आप भी तो जाग रहे हैं।
नंद बाबा: मैं तो... बैल देख रहा था।
राधा: बाबा, बैल तो सो गए।
नंद बाबा: हाँ... सो गए। बस हम तीन बचे।
कुरुक्षेत्र से पहले का टीला · तीसरे दिन की दोपहर
सूत्रधार: तीसरे दिन टीले पर चढ़ते ही सामने मैदान फैल गया। लाखों लोग, हज़ारों तंबू।
नंद बाबा: इतने लोग... इसमें उसे कैसे ढूँढेंगे, यशोदा?
यशोदा: वह ढूँढ लेगा, जी। बचपन में छिपता वह था, ढूँढती मैं थी। आज उसकी बारी है।
ललिता: राधा... देखो। कुरुक्षेत्र।
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Tradition & source notes
ब्रह्मवैवर्त पुराण (श्रीकृष्णजन्म खंड — उद्धव-राधा प्रसंग), गर्ग संहिता, गीत गोविंद व ब्रज की भक्ति परंपरा; अक्रूर-आगमन भागवत 10.39, उद्धव-प्रसंग व भ्रमर-गीत भागवत 10.46–47, कुरुक्षेत्र-मिलन भागवत 10.82 से (भागवत में राधा का नाम नहीं आता)। बाँसुरी राधा को सौंपना और कृष्ण का फिर बाँसुरी न बजाना ब्रज की लोक-परंपरा है, ग्रंथ-वचन नहीं।