Radha-Krishna: The Flute That Never Played Again
Uddhava arrives with a message. Vrindavan teaches him another language of devotion.
हवा ने बताया
पीपल के नीचे · ढलती धूप
राधा: रोज़ पोंछती हूँ। कभी बजाई नहीं। तुमने कहा था, बस सँभालना है।
श्रीकृष्ण: और मैंने भी... उस रात के बाद कभी नहीं बजाई। किसी बाँसुरी को होंठ नहीं लगाए।
राधा: जानती हूँ।
श्रीकृष्ण: कैसे?
राधा: हवा ने बताया। जिस दिन तुम बजाते, वह यहाँ आकर कुछ और ही बहती। मैंने उसे रोज़ सुना है।
सूत्रधार: राधा बाँसुरी गोद में लिए बैठी रहीं। उन्होंने उसे आगे नहीं बढ़ाया। कृष्ण ने हाथ नहीं बढ़ाया।
श्रीकृष्ण: मैया ने तुमसे कहा था, अगर मैं माँगूँ, तो दे देना?
राधा: तुम्हें यह भी पता है?
श्रीकृष्ण: मैया की बातें हवा से पहले मुझ तक पहुँचती हैं।
राधा: तो माँगोगे?
श्रीकृष्ण: नहीं, राधा। वह जहाँ है, वहीं ठीक है। मेरे पास रही, तो सभाओं में धूल खाएगी। तुम्हारे पास है, तो रोज़ पोंछी जाती है।
राधा: बहुत हिसाब लगाने लगे हो। राजा बनकर।
श्रीकृष्ण: राजकाज की आदत है। ...राधा, मैं तुमसे एक बात कहने आया था। वही बात, जो मैंने हर सखी से कही, जो उद्धव के हाथ भी भेजी थी—
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Tradition & source notes
ब्रह्मवैवर्त पुराण (श्रीकृष्णजन्म खंड — उद्धव-राधा प्रसंग), गर्ग संहिता, गीत गोविंद व ब्रज की भक्ति परंपरा; अक्रूर-आगमन भागवत 10.39, उद्धव-प्रसंग व भ्रमर-गीत भागवत 10.46–47, कुरुक्षेत्र-मिलन भागवत 10.82 से (भागवत में राधा का नाम नहीं आता)। बाँसुरी राधा को सौंपना और कृष्ण का फिर बाँसुरी न बजाना ब्रज की लोक-परंपरा है, ग्रंथ-वचन नहीं।
