Radha-Krishna: The Flute That Never Played Again
Uddhava arrives with a message. Vrindavan teaches him another language of devotion.
मंगलू
वृंदावन की गली · भोर
सूत्रधार: उजाला हुआ तो उद्धव उसी छोर की ओर निकले। नंद बाबा के द्वार पर सुनहरा रथ देखकर गली की गोपियाँ ठिठक गईं। कोई फुसफुसाई, कहीं अक्रूर फिर तो नहीं आ गया?
मंगलू: ओ रथ वाले भैया! तुम मथुरा से आए हो ना? कान्हा भैया के पास से?
उद्धव: हाँ। और तुम कौन हो, नन्हे ग्वाले?
मंगलू: मंगलू! कान्हा भैया ने मुझे गाय दुहना सिखाया था। धौली बस उनकी बात मानती थी। उन्होंने मेरे लिए कुछ भेजा?
उद्धव: उन्होंने कहा है, ब्रज के सब ग्वालों से कहना, गायों का ध्यान रखें।
मंगलू: सब ग्वालों में मैं भी हूँ ना?
उद्धव: हाँ, मंगलू। तुम भी।
मंगलू: मैं रोज़ गायें वहीं ले जाता हूँ जहाँ वह ले जाते थे। पर धौली वहाँ पहुँचकर घास छोड़ देती है और ऊपर देखती रहती है।
उद्धव: ऊपर? क्या देखती है?
मंगलू: कदंब की वह डाल, जिस पर कान्हा भैया बैठते थे। अब वहाँ कोई नहीं बैठता। हम किसी को बैठने नहीं देते।
उद्धव: क्यों?
मंगलू: अगर वह लौटें और जगह भरी मिले, तो?
उद्धव: ...ठीक कहते हो।
मंगलू: चलो, उद्धव भैया। मैं तुम्हें दिखाता हूँ। वह जगह... जहाँ अब कोई नहीं बैठता।
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Tradition & source notes
ब्रह्मवैवर्त पुराण (श्रीकृष्णजन्म खंड — उद्धव-राधा प्रसंग), गर्ग संहिता, गीत गोविंद व ब्रज की भक्ति परंपरा; अक्रूर-आगमन भागवत 10.39, उद्धव-प्रसंग व भ्रमर-गीत भागवत 10.46–47, कुरुक्षेत्र-मिलन भागवत 10.82 से (भागवत में राधा का नाम नहीं आता)। बाँसुरी राधा को सौंपना और कृष्ण का फिर बाँसुरी न बजाना ब्रज की लोक-परंपरा है, ग्रंथ-वचन नहीं।