Shri Krishna

Radha-Krishna: The Flute That Never Played Again

Uddhava arrives with a message. Vrindavan teaches him another language of devotion.

Original Hindi text48 chapters
43 / 48
Chapter 43

महारानी झुकीं

ब्रज का पड़ाव · ढलती दोपहर

श्रीकृष्ण: जाओ, रुक्मिणी। ललिता, इन्हें ले जाओ।

सरोवर का दूसरा किनारा, पीपल के नीचे · ढलती दोपहर

सूत्रधार: लोक-परंपरा कहती है, उस दोपहर द्वारका की पटरानी, ब्रज की एक ग्वालिन से मिलने पैदल चलीं।

ललिता: राधा... कोई तुमसे मिलने आई हैं।

राधा: आइए... आप? आपके वस्त्र... आप द्वारका से हैं?

रुक्मिणी: मैं रुक्मिणी हूँ।

राधा: महारानी... आप यहाँ? मेरे पास? बैठिए... यहाँ धूल है, रुकिए, मैं आँचल बिछा दूँ—

रुक्मिणी: नहीं, बहन। आप बैठी रहिए।

राधा: अरे... यह क्या कर रही हैं? आप महारानी हैं। मेरे पाँव क्यों...

रुक्मिणी: जिसके पास उनकी बाँसुरी है, उसके आगे झुकना छोटा नहीं, बहन। बरसों से सोचती थी, वह साँझ को उत्तर की ओर क्यों देखते हैं। आज जान गई।

राधा: उठिए, बहन। ...आइए, गले लगिए। आपने उन्हें सँभाला है। मैंने तो बस उनकी बाँसुरी।

रुक्मिणी: उन्होंने कहा था, आप पाँव नहीं छूने देंगी। गले लगा लेंगी।

राधा: वह मुझे जानते हैं।

रुक्मिणी: वह आ रहे हैं, बहन। मैं चलती हूँ। यह पल आप दोनों का है। चलो, ललिता।

राधा: ...आ गए?

All chapters (48)
1. चुप गाँव2. पीला पटुका3. रात भर की बातें4. मथानी की आवाज़5. मंगलू6. ख़ाली डाल7. एक पहर की बात8. द्वार के पीछे से9. मेरा काम हो गया10. संदेश या वह?11. धूल में पैरों के निशान12. धनुष-यज्ञ का न्योता13. आधी रात की आहट14. अक्रूर नाम15. भीड़ में ढूँढती आँखें16. उड़ती धूल17. गोद में बाँसुरी18. सौंपा है19. आज नहीं20. और अगर...21. कभी गया ही नहीं22. एक और दूत23. भौंरे से बातें24. एक ही मन25. कल रात बता दिया था26. जो भीतर है27. आँखों की आदत28. एक काम बाकी है29. काश मैं बेल होता30. गायें ऊपर देखती हैं31. इसीलिए भेजा था32. रणछोड़33. महारानी का सवाल34. वह वृंदावन में है35. दीया थकता है क्या36. देहरी का माखन37. सूर्यग्रहण38. एक बाँसुरी लेकर39. टीले के उस पार40. गाय का निशान41. मैया42. सखियाँ43. महारानी झुकीं44. थके लगते हो45. हवा ने बताया46. पहले दिन से47. जो बजी नहीं48. कदंब की धुन
Tradition & source notes

ब्रह्मवैवर्त पुराण (श्रीकृष्णजन्म खंड — उद्धव-राधा प्रसंग), गर्ग संहिता, गीत गोविंद व ब्रज की भक्ति परंपरा; अक्रूर-आगमन भागवत 10.39, उद्धव-प्रसंग व भ्रमर-गीत भागवत 10.46–47, कुरुक्षेत्र-मिलन भागवत 10.82 से (भागवत में राधा का नाम नहीं आता)। बाँसुरी राधा को सौंपना और कृष्ण का फिर बाँसुरी न बजाना ब्रज की लोक-परंपरा है, ग्रंथ-वचन नहीं।

Back to stories
HomeDiya SevaPujasStoriesMy bookings