Radha-Krishna: The Flute That Never Played Again
Uddhava arrives with a message. Vrindavan teaches him another language of devotion.
मेरा काम हो गया
राधा के घर का द्वार · दोपहर
उद्धव: गाँव को सुन लूँ? मैंने रात भर नंद बाबा को सुना, भोर में माँ को सुना। अब और किसे?
ललिता: हमें, उद्धव जी। चलिए, घाट पर बैठते हैं।
यमुना घाट की सीढ़ियाँ · दोपहर
उद्धव: कहो। क्या सुनाना है?
विशाखा: सुनाना नहीं, पूछना है। वह मोरपंख अब भी लगाते हैं?
उद्धव: मथुरा में वह राजमुकुट पहनते हैं। सोने का।
विशाखा: ...अच्छा। सोने का। भारी होगा।
ललिता: और गायें? वहाँ गायें हैं?
उद्धव: राजा की गौशाला है, हज़ारों गायें। पर उन्हें चराने दूसरे ग्वाले जाते हैं।
ललिता: तो वह अब गाय नहीं चराते।
विशाखा: उद्धव जी, एक बात... वह कभी राधा का नाम लेते हैं?
उद्धव: सच कहूँ? मैंने कभी उनके मुँह से नहीं सुना।
सूत्रधार: विशाखा ने सीढ़ी से एक कंकड़ उठाकर पानी में डाल दिया। देर तक कोई कुछ नहीं बोला।
उद्धव: देखो, यह सब मोह है। नाम लेने से, गाय चराने से प्रेम नहीं नापा जाता। वह राजा हैं, उन पर पूरे राज्य का भार है।
ललिता: हम उनसे कुछ माँग नहीं रहीं, उद्धव जी। बस पूछ रही हैं।
उद्धव: और मैंने बता दिया। संदेश दे दिया, सबके प्रश्नों का उत्तर दे दिया। मेरा काम हो गया। कल भोर होते ही मैं मथुरा लौट जाऊँगा।
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Tradition & source notes
ब्रह्मवैवर्त पुराण (श्रीकृष्णजन्म खंड — उद्धव-राधा प्रसंग), गर्ग संहिता, गीत गोविंद व ब्रज की भक्ति परंपरा; अक्रूर-आगमन भागवत 10.39, उद्धव-प्रसंग व भ्रमर-गीत भागवत 10.46–47, कुरुक्षेत्र-मिलन भागवत 10.82 से (भागवत में राधा का नाम नहीं आता)। बाँसुरी राधा को सौंपना और कृष्ण का फिर बाँसुरी न बजाना ब्रज की लोक-परंपरा है, ग्रंथ-वचन नहीं।
