Radha-Krishna: The Flute That Never Played Again
Uddhava arrives with a message. Vrindavan teaches him another language of devotion.
गाय का निशान
कुरुक्षेत्र, सरोवर का किनारा · ग्रहण के समय
सूत्रधार: वे शंख ग्रहण की ख़बर दे रहे थे। अगली दोपहर ग्रहण लगा। दिन में अँधेरा उतर आया। लाखों लोगों ने एक साथ सरोवर में डुबकी ली।
नंद बाबा: यशोदा, डुबकी लो। मन में उसी का नाम लेना।
यशोदा: और किसका लूँगी, जी।
ललिता: राधा, तुम्हारे हाथ ठंडे हैं।
राधा: पानी ठंडा है, ललिता। बस पानी।
यशोदा: हे सूरज देवता, ग्रहण छूटे, तो सबसे पहले मेरे लाला का मुँह दिखा देना। बस इतना माँगती हूँ।
नंद बाबा: वह भी यहीं कहीं डुबकी ले रहा होगा, यशोदा। इसी पानी में।
यादवों का शिविर · ग्रहण छूटते
बलराम: कन्हैया, ग्रहण छूट गया। सूरज भी लौट आया। चल, ब्रज वालों को ढूँढें।
श्रीकृष्ण: इतनी भीड़ में कहाँ ढूँढोगे, दाऊ?
बलराम: बाबा की गाड़ी? आँख मूँदकर पहचान लूँ। उनके बैलों की घंटियाँ अलग बजती हैं। देख... वह देख! पूरब की ओर। पीली ध्वजा पर गाय का निशान!
श्रीकृष्ण: यह आवाज़... धौली की बछिया... दाऊ, यह तो हमारी गायों की आवाज़ है।
बलराम: कन्हैया? कहाँ भाग रहा है? रुक! अरे, राजा है तू, ऐसे दौड़ेगा?
श्रीकृष्ण: आज नहीं, दाऊ... आज बस ग्वाला हूँ।
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Tradition & source notes
ब्रह्मवैवर्त पुराण (श्रीकृष्णजन्म खंड — उद्धव-राधा प्रसंग), गर्ग संहिता, गीत गोविंद व ब्रज की भक्ति परंपरा; अक्रूर-आगमन भागवत 10.39, उद्धव-प्रसंग व भ्रमर-गीत भागवत 10.46–47, कुरुक्षेत्र-मिलन भागवत 10.82 से (भागवत में राधा का नाम नहीं आता)। बाँसुरी राधा को सौंपना और कृष्ण का फिर बाँसुरी न बजाना ब्रज की लोक-परंपरा है, ग्रंथ-वचन नहीं।
