Radha-Krishna: The Flute That Never Played Again
Uddhava arrives with a message. Vrindavan teaches him another language of devotion.
सखियाँ
ब्रज का पड़ाव, कुरुक्षेत्र · ढलती दोपहर
श्रीकृष्ण: जानता हूँ, मैया। कहाँ है?
यशोदा: सरोवर के उस पार, पीपल के नीचे। कहती थी, पहले मैया मिल ले, फिर...
ललिता: कान्हा...
श्रीकृष्ण: ललिता! विशाखा! तुम सब...
विशाखा: राजा हो गए हो, कान्हा। पर दौड़ते हुए अब भी पटुका गिरा देते हो।
श्रीकृष्ण: यह आदत द्वारका भी नहीं छुड़ा पाई, विशाखा।
ललिता: बहुत बरस हो गए, कान्हा। तुमने कहा था, लौटूँगा।
श्रीकृष्ण: कहा था, ललिता। और नहीं आया। इसका कोई उत्तर मेरे पास नहीं।
ललिता: हमने उत्तर माँगा भी नहीं। उद्धव जी से बस इतना पूछा था... याद करते हो?
श्रीकृष्ण: हर साँझ, ललिता। जब सूरज ढलता है।
विशाखा: यह हमें पता था। फिर भी तुम्हारे मुँह से सुननी थी।
श्रीकृष्ण: सखियो, तुम्हारे प्रेम ने ही मुझे बाँधे रखा। मैं जहाँ भी गया, उस डोर का दूसरा सिरा यहीं था।
रुक्मिणी: स्वामी... क्षमा करें। क्या ये ही ब्रज की सखियाँ हैं?
श्रीकृष्ण: हाँ, रुक्मिणी।
रुक्मिणी: प्रणाम, बहनो। स्वामी, एक विनती है। राधा जी के पास... मुझे पहले जाने देंगे?
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Tradition & source notes
ब्रह्मवैवर्त पुराण (श्रीकृष्णजन्म खंड — उद्धव-राधा प्रसंग), गर्ग संहिता, गीत गोविंद व ब्रज की भक्ति परंपरा; अक्रूर-आगमन भागवत 10.39, उद्धव-प्रसंग व भ्रमर-गीत भागवत 10.46–47, कुरुक्षेत्र-मिलन भागवत 10.82 से (भागवत में राधा का नाम नहीं आता)। बाँसुरी राधा को सौंपना और कृष्ण का फिर बाँसुरी न बजाना ब्रज की लोक-परंपरा है, ग्रंथ-वचन नहीं।
