Shri Krishna

Radha-Krishna: The Flute That Never Played Again

Uddhava arrives with a message. Vrindavan teaches him another language of devotion.

Original Hindi text48 chapters
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Chapter 42

सखियाँ

ब्रज का पड़ाव, कुरुक्षेत्र · ढलती दोपहर

श्रीकृष्ण: जानता हूँ, मैया। कहाँ है?

यशोदा: सरोवर के उस पार, पीपल के नीचे। कहती थी, पहले मैया मिल ले, फिर...

ललिता: कान्हा...

श्रीकृष्ण: ललिता! विशाखा! तुम सब...

विशाखा: राजा हो गए हो, कान्हा। पर दौड़ते हुए अब भी पटुका गिरा देते हो।

श्रीकृष्ण: यह आदत द्वारका भी नहीं छुड़ा पाई, विशाखा।

ललिता: बहुत बरस हो गए, कान्हा। तुमने कहा था, लौटूँगा।

श्रीकृष्ण: कहा था, ललिता। और नहीं आया। इसका कोई उत्तर मेरे पास नहीं।

ललिता: हमने उत्तर माँगा भी नहीं। उद्धव जी से बस इतना पूछा था... याद करते हो?

श्रीकृष्ण: हर साँझ, ललिता। जब सूरज ढलता है।

विशाखा: यह हमें पता था। फिर भी तुम्हारे मुँह से सुननी थी।

श्रीकृष्ण: सखियो, तुम्हारे प्रेम ने ही मुझे बाँधे रखा। मैं जहाँ भी गया, उस डोर का दूसरा सिरा यहीं था।

रुक्मिणी: स्वामी... क्षमा करें। क्या ये ही ब्रज की सखियाँ हैं?

श्रीकृष्ण: हाँ, रुक्मिणी।

रुक्मिणी: प्रणाम, बहनो। स्वामी, एक विनती है। राधा जी के पास... मुझे पहले जाने देंगे?

All chapters (48)
1. चुप गाँव2. पीला पटुका3. रात भर की बातें4. मथानी की आवाज़5. मंगलू6. ख़ाली डाल7. एक पहर की बात8. द्वार के पीछे से9. मेरा काम हो गया10. संदेश या वह?11. धूल में पैरों के निशान12. धनुष-यज्ञ का न्योता13. आधी रात की आहट14. अक्रूर नाम15. भीड़ में ढूँढती आँखें16. उड़ती धूल17. गोद में बाँसुरी18. सौंपा है19. आज नहीं20. और अगर...21. कभी गया ही नहीं22. एक और दूत23. भौंरे से बातें24. एक ही मन25. कल रात बता दिया था26. जो भीतर है27. आँखों की आदत28. एक काम बाकी है29. काश मैं बेल होता30. गायें ऊपर देखती हैं31. इसीलिए भेजा था32. रणछोड़33. महारानी का सवाल34. वह वृंदावन में है35. दीया थकता है क्या36. देहरी का माखन37. सूर्यग्रहण38. एक बाँसुरी लेकर39. टीले के उस पार40. गाय का निशान41. मैया42. सखियाँ43. महारानी झुकीं44. थके लगते हो45. हवा ने बताया46. पहले दिन से47. जो बजी नहीं48. कदंब की धुन
Tradition & source notes

ब्रह्मवैवर्त पुराण (श्रीकृष्णजन्म खंड — उद्धव-राधा प्रसंग), गर्ग संहिता, गीत गोविंद व ब्रज की भक्ति परंपरा; अक्रूर-आगमन भागवत 10.39, उद्धव-प्रसंग व भ्रमर-गीत भागवत 10.46–47, कुरुक्षेत्र-मिलन भागवत 10.82 से (भागवत में राधा का नाम नहीं आता)। बाँसुरी राधा को सौंपना और कृष्ण का फिर बाँसुरी न बजाना ब्रज की लोक-परंपरा है, ग्रंथ-वचन नहीं।

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