Radha-Krishna: The Flute That Never Played Again
Uddhava arrives with a message. Vrindavan teaches him another language of devotion.
देहरी का माखन
कदंब के नीचे · साँझ ढलते
ललिता: हवा है, राधा।
राधा: हाँ। हवा ही है। पर आज उसने कुछ कहा है।
यशोदा: कौन है वहाँ? राधा, बेटी?
राधा: मैया! आप इतनी दूर पैदल? अँधेरा हो रहा है। आइए, यहाँ बैठिए।
यशोदा: घर में मन नहीं लगा, बेटी। सोचा, जहाँ उसकी बाँसुरी है, वहीं थोड़ी देर बैठ लूँ।
राधा: यह आपकी ही है, मैया। जब चाहें आ जाया कीजिए।
यशोदा: आज भी देहरी पर माखन रखकर आई हूँ। बरसों हो गए। रोज़ कौवे खा जाते हैं, रोज़ फिर रख देती हूँ। तेरे नंद बाबा हँसते हैं।
राधा: वह हँसते नहीं, मैया। मैंने देखा है, वह ख़ुद उस पर पत्ता ढक देते हैं।
यशोदा: सच? ...वह भी ना। बेटी, एक बात बता। तू उससे कभी नाराज़ नहीं हुई? बरसों से एक संदेसा तक नहीं आया।
राधा: संदेसा तो रोज़ आता है, मैया। गायें लौटती हैं, तो लगता है वह लौटे। माखन खट्टा होता है, तो लगता है उन्होंने चखा।
यशोदा: तू कैसी लड़की है, राधा...
नंद बाबा: यशोदा! यशोदा, यहाँ हो? ख़बर आई है! द्वारका की ख़बर!
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Tradition & source notes
ब्रह्मवैवर्त पुराण (श्रीकृष्णजन्म खंड — उद्धव-राधा प्रसंग), गर्ग संहिता, गीत गोविंद व ब्रज की भक्ति परंपरा; अक्रूर-आगमन भागवत 10.39, उद्धव-प्रसंग व भ्रमर-गीत भागवत 10.46–47, कुरुक्षेत्र-मिलन भागवत 10.82 से (भागवत में राधा का नाम नहीं आता)। बाँसुरी राधा को सौंपना और कृष्ण का फिर बाँसुरी न बजाना ब्रज की लोक-परंपरा है, ग्रंथ-वचन नहीं।
