Radha-Krishna: The Flute That Never Played Again
Uddhava arrives with a message. Vrindavan teaches him another language of devotion.
मैया
ब्रज का पड़ाव, कुरुक्षेत्र · दोपहर ढलते
नंद बाबा: कौन... कौन दौड़ा आ रहा है इधर? राजा जैसे कपड़े...
श्रीकृष्ण: बाबा!
नंद बाबा: कृष्ण... मेरा कृष्ण...
बलराम: और मैं भी, बाबा! दाऊ! मुझे भूल गए?
नंद बाबा: आ, बलराम... आ। दोनों आओ। हे भगवान, कितने बड़े हो गए। मेरे ग्वालों के सिर पर मुकुट...
बलराम: बाबा, आप तो बूढ़े हो गए। पर पकड़ अब भी वैसी ही है।
नंद बाबा: तुम दोनों की राह देखते-देखते, बेटा।
श्रीकृष्ण: मैया...
यशोदा: लाला...?
श्रीकृष्ण: हाँ, मैया। तेरा लाला।
यशोदा: आ... इधर आ। मुझे देखने दे। ...ऊँचा हो गया है। पर आँखें वही हैं। तेरे बाबा ठीक कहते थे।
श्रीकृष्ण: मैया, मुझे गोद में मत खींच। सब देख रहे हैं।
यशोदा: देखने दे। उनके लिए राजा होगा। मेरे लिए वही है, जो ऊखल से बँधा था। एक बात सच बता... वहाँ ठीक से खाता है?
श्रीकृष्ण: तेरे माखन के बिना? कभी नहीं, मैया।
यशोदा: तीन मटकियाँ लाई हूँ। सब तेरी।
श्रीकृष्ण: तीन? मैया, द्वारका में भी कोई इतना प्यार से नहीं खिलाता।
यशोदा: और सुन, लाला... वह भी आई है। पर भीड़ में नहीं आएगी।
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Tradition & source notes
ब्रह्मवैवर्त पुराण (श्रीकृष्णजन्म खंड — उद्धव-राधा प्रसंग), गर्ग संहिता, गीत गोविंद व ब्रज की भक्ति परंपरा; अक्रूर-आगमन भागवत 10.39, उद्धव-प्रसंग व भ्रमर-गीत भागवत 10.46–47, कुरुक्षेत्र-मिलन भागवत 10.82 से (भागवत में राधा का नाम नहीं आता)। बाँसुरी राधा को सौंपना और कृष्ण का फिर बाँसुरी न बजाना ब्रज की लोक-परंपरा है, ग्रंथ-वचन नहीं।
