Radha-Krishna: The Flute That Never Played Again
Uddhava arrives with a message. Vrindavan teaches him another language of devotion.
थके लगते हो
पीपल के नीचे · ढलती धूप
श्रीकृष्ण: आ गया, राधा।
सूत्रधार: राधा ने मुड़कर नहीं देखा। ढलती धूप पीपल के पत्तों से छनकर दोनों पर पड़ रही थी। बरसों बाद, दोनों आमने-सामने थे।
राधा: बैठो। थके लगते हो।
श्रीकृष्ण: बरसों बाद मिली हो, और पहली बात यह?
राधा: और क्या कहूँ? मुकुट भारी है, दिख रहा है। माथे पर लकीरें पड़ गई हैं।
श्रीकृष्ण: द्वारका, युद्ध, सभाएँ... हाँ, थक गया हूँ, राधा। तुमसे क्या छिपाऊँ।
राधा: तो थोड़ी देर यहाँ बैठ जाओ। यहाँ कोई राजा नहीं है।
श्रीकृष्ण: यहाँ कोई राजा नहीं... यह सुनने को बरसों तरस गया, राधा।
राधा: तो जी भर के सुन लो।
श्रीकृष्ण: राधा... तुमने कभी शिकायत क्यों नहीं की? एक संदेश तक नहीं भेजा। बस इतना, कि बाँसुरी सँभली हुई है।
राधा: शिकायत किससे करती? उससे, जो रोज़ साँझ कदंब के नीचे आकर बैठता हो?
श्रीकृष्ण: ...तुमने मुझे वहाँ देखा?
राधा: देखा नहीं। जाना। हर साँझ।
सूत्रधार: राधा ने गोद का पीला कपड़ा धीरे-धीरे खोला।
श्रीकृष्ण: यह... अब भी तुम्हारे पास है। उसी तरह। जैसे कल ही दी हो।
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Tradition & source notes
ब्रह्मवैवर्त पुराण (श्रीकृष्णजन्म खंड — उद्धव-राधा प्रसंग), गर्ग संहिता, गीत गोविंद व ब्रज की भक्ति परंपरा; अक्रूर-आगमन भागवत 10.39, उद्धव-प्रसंग व भ्रमर-गीत भागवत 10.46–47, कुरुक्षेत्र-मिलन भागवत 10.82 से (भागवत में राधा का नाम नहीं आता)। बाँसुरी राधा को सौंपना और कृष्ण का फिर बाँसुरी न बजाना ब्रज की लोक-परंपरा है, ग्रंथ-वचन नहीं।
